पेट की आग के लिए इंसान भी जानवर बन जाता है फिर बाघ तो असल में ही जानवर है
देश भर में घट रहे बाघों के लिए इन दिनों टेलीविजन पर एक मुहिम छिड़ी हुई है। एक विज्ञापन के जरिए बताया जा रहा है कि देश में केवल 1411 बाघ बचे हैं और इन्हें बचाने के लिए एसएमएस कीजिए। क्यों किसी के मन मस्तिकष में यह सवाल नहीं उठता की, क्या केवल संदेश भेजने मात्र से ही बाघों को बचाया जा सकता है? यह अलग बात है कि इतने सालों से सिर्फ संदेश भेजते रहने के ही कारण आज हमारा राष्ट्रीय पशु बाघ यानि टाईगर इतनी दयनीय स्थिति में आ गया है कि उसे बचाने के लिए चारों ओर हाहाकार मचा है। बाघ को बचाने के लिए क्या किया जाए यह समझने के लिए जंगलों की खाक छाननी होती है और जानवरों और जंगल के आस-पास रहने वालों के व्यवहार का अध्ययन करना होता है। आज वन विभाग का कोई भी अधिकारी जंगलों के कितना नजदीक है यह इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाघों की संख्या घटती जाती है और किसी को कानों कान तक खबर नहीं होती। खैर, हकीकत यह है कि बाघ लुप्त हो रहा है देश से भी और राजस्थान से भी। राजस्थान बाघों के लिए रियासतकालीन समय में उत्तम स्थान था। पर्यावरणविदें की राय में बाघ के खत्म होने का अर्थ है संपूर्ण ईको सिस्टम का खत्म होना। अगर किसी जंगल में बाघ है तो मान लेना चाहिए कि उस क्षेत्र का पारिस्थितिक तंत्र बहुत ही अच्छा है। सीधा सा अर्थ है कि जंगल बचेगा तो बाघ बचेगा। जंगल और बाघ एक दूसरे के पूरक हैं लेकिन इन दिनों सभी को एक ही चिंता है कि सेव टाईगर यानि बाघ बचाओ। सीधी सी गणित है बाघ के लिए आदर्श पस्थितियां तैयार करो और बाघ के शावकों की अठखेलियां देखो लेकिन जंगल और पर्यावरण बचाने की दिशा में क्या काम हो रहा है वो केवल फाइलों में ही है। देश में केवल 1411 बाघ हैं और राजस्थान में मात्र 41। सवाईमाधोपुर के रणथम्भौर को बाघों के लिए पहचाना जाता है। सरिस्का भी कुछ दिनों पहले तक बाघ के लिए ही मशहूर था लेकिन एक एक करके सारे बाघों का शिकार हो गया या फिर वे कालकलवित हो गए। क्या किसी अफसर को इसके लिए दोषी ठहराया गया शायद नहीं। क्योंकि तब तक किसी को बाघ के मरने से फर्क नहीं पड़ता था। अब जब सारे मारे गए तो लोगों को चिंता सता रही है। जानकारों की राय में सरिस्का में जिन तीन बाघों को ले जा कर बसाया गया है एक शरणार्थी शिविर की भांति वह कितना सफल होता है यह शायद दस से बीस साल में पता चले। दुनिया में बाघ की आठ प्रजातियां पाई जाती थी। जिनमें से तीन तो समाप्त हो चुकी हैं और पांच बची हैं। कैस्पियन टाईगर,चाइनीज टाइगर,जर्मन टाईगर, साइबेरियन टाईगर, सुमात्रा टाईगर,साउथ चाइनीज टाईगर,जावा टाईगर और इंडियन टाईगर नामक प्रजातियां थी और जिनमें से कैस्पियन टाईगर,चाइनीज टाइगर,जर्मन टाईगर तो लुप्त ही हो चुके हैं।
जानकारों की राय में राजस्थान में बाघों का लुप्त होने का कारण जंगलों का घटना है। जब राजस्थान का गठन हुआ उस समय प्रदेश के जंगलों की अंधाधुंध कटाई हुई। 1972 में जब प्रोजेक्ट टाईगर अस्तित्व में आया तब तक वन विभाग के सामने खत्म हो रहे जंगलों को बचाना एक मात्र उद्देश्य था। उस समय जंगलों को बचाने के लिए वन विभाग द्वारा एक ही प्रजाति के वृक्षों को रोप कर जंगल बचाने की कवायद की गई। लगभग मैदानों में तब्दील होते जंगलों को बचाने के लिए अकेशिया टोरटलिस(इजरायली बबूल),जूलीफलोरा(विलायती बबूल),शीशम और सफेदा सहित कुछ अन्य प्रजातियों के वृक्षों को लगाया गया। इससे हरियाली तो मिली लेकिन चारा और घास खत्म हो गई। साफतौर पर जंगल का त्रि-स्तरीय ढांचा बिगड़ गया। जिसका सीधा असर सरीसर्प वर्ग, खरगोश, सियार, लोमड़ी और सांभर, चीतल और हिरणों आदी पर पड़ा। खाने की कमी के कारण इनकी वंशवृद्धि भी कम होती गई और बाघ को अपने स्वादिष्ट भोजन से महरूम होना पड़ा। बाघों के लुप्त होने के पीछे यह भी एक बहुत बड़ा कारण है कि एन्टीलोब्स(सांभर, चीतल और हिरण आदी) खत्म होगए।
इस बात की सत्यता इसी बात से सामने आ जाती है कि प्रदेश के वन मंत्री ने दिल्ली एक पत्र लिखकर दिल्ली के चिडिय़ाघर और आस पास अधिक हो चुके एन्टीलोब्स को राजस्थान भेजने की मांग की है जिससे की सरिस्का में बाघों के पुनर्वास में दिक्कत नहीं आए।
राजस्थान की खासियत है कि यहां आज तक आदमखोर बाघ नहीं हुआ और राजस्थान के जंगलों में जितना नजदीक से बाघ को देखा जा सकता है वह देश में ओर कहीं नहीं है। बाघ की वंशवृद्धि पूरे साल की जा सकती है अगर आदर्श परिस्थितियां होतो लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। सवाईमाधोपुर में केवल रणथम्भौर पर सभी का ध्यान है लेकिन मानसिंह सेंचुरी, रामगढ़ अभ्यारण्य और कैलादेवी के जंगलों पर किसी की नजर नहीं। इसी प्रकार अलवर से होते हुए बाघों के प्रिय स्थान डिगौता,जमवारामगढ़,नाहरगढ़ और मायला बाग की ओर कोई नहीं देख रहा। ऐसे ही हाड़ौती क्षेत्र में दर्रा और उससे लगते हुए वन्य क्षेत्र में सांभर, चीतल और हिरण क्यों नहीं बढ़ाए जा रहे । कॉरिडोर विकसित होते तो बाघ नहीं मरते क्योंकि भोजन के साथ साथ पानी की कमी झेल रहे बाघ अपने क्षेत्र से बाहर आते हैं शिकारियों या फिर किसानों और पशुपालकों द्वारा संगठित होकर मार दिए जाते हैं। ऐसे में कैसे बचे बाघ। सदाबाहर, आद्र्र,पतझड़ और तराई क्षेत्रों के वनों में पाया जाना वाला टाईगर एक अच्छा तैराक होता है। आजादी से पहले रावली टाटगढ़,कुम्भलगढ़,फुलवारी, जयसमंद,चीरवाघाटी और सीतामाता अभ्यारण्य में बाघों की संख्या प्रचुर मात्रा में थी। इससे अर्थ यह निकलता है कि राजस्थान बाघों के लिए आज भी मुफीद जगह है यदि उसे अपना आहर मिलता रहे तो क्योंकि पेट की आग के लिए इंसान भी जानवर बन जाता है फिर बाघ तो असल में ही जानवर है।
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कुछ दिनों पहले एक खबर आई कि
सेंटल जू अथॉरिटी ने देश भर के चिडिय़ाघरों में बंद बाघों(टाइगर) के प्रजनन से रोक हटा ली है। राजस्थान में भी इसे लेकर खुशी का माहौल है कि प्रदेश के चिडिय़ाघरों में बंद बूढ़े शेरों से आखिर कुछ पाने की उम्मीद जगेगी। जानकारों का मानना है कि सजावटी शेर पाने की दिशा में यह अच्छा कदम है। राजस्थान में इस घोषणा के बाद उम्मीद बंधी है कि यहां फिर देश का राष्ट्रीय पशु अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त कर लेगा। जोधपुर से इसकी शुरुआत की जा रही है। जहां पर 8 साल के रुद्र और 11 साल की सीता (बाघिन) को मेल कराने के लिए वन विभाग प्रयास कर रहा है। वन विभाग के सूत्रों के अनुसार पिंजरे में बंद और चिडिय़ाघरों में पैदा हुए बाघों में जंगली आदतें नहीं होती अत: पहले रुद्र और सीता को माचिया के बायलोजिकल पार्क में रखा जाएगा । मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक आर. एन. महरोत्रा के अनुसार सेंट्रल जू अथॉरिटी ने चिडिय़ाघरों में बाघों को साथ रखने की पाबंदी भले ही हटा ली हो लेकिन इसके लिए चिडिय़ाघरों में पर्याप्त संसाधनों का होना जरुरी है। सूत्रों के अनुसार वन विभाग के अधिकारियों में इस सेंट्रल जू अथॉरिटी के आदेश के बाद से ही दो मत हो गए हैं।
Thursday, May 27, 2010
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