Wednesday, September 6, 2023
सचिन पायलट का पुनर्वास और सियासी गलियारों में हलचल
जयपुर।
राजस्थान के विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस पार्टी ने सीडब्ल्यूसी में प्रदेश के पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट को स्थान दिया है। पायलट के इस पुनर्वास ने, कांग्रेस सहित सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। कमेटी में पायलट को शामिल करने का फैसला कांग्रेस की उनकी नाराजगी दूर करने के प्रयास से जोड़ा जा रहा है।
कमेटी में पायलट को शामिल कर कांग्रेस नेतृत्व ने बड़ा संकेत देने की कोशिश की है। इस कमेटी में सचिन पायलट, भंवर जितेंद्र सिंह, महेंद्रजीत सिंह मालवीय और हरीश चौधरी को शामिल किया है। सीएम गहलोत और पायलट बीच के मतभेद और मनभेद मिटाने को लेकर दिल्ली में बैठक हुई थी। इसके बाद पायलट को पार्टी की ओर से जो आश्वासन मिले। उसके बाद से पायलट काफी शांत और संयत दिखाई दे रहे थे। इसी बीच सीडब्ल्यूसी कमेटी में पायलट को शामिल कर कांग्रेस ने कई संकेत देने की कोशिश की है। वहीं कांग्रेस की राष्ट्रीय स्तर की कमेटी में इस बदलाव को लेकर सियासी गलियारों में काफी चर्चा हो रही है।
कमेटी में नाम शामिल होने के बाद सचिन पायलट ने ट्वीट कर कांग्रेस नेता राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी के इस फैसले का स्वागत करते हुए आभार जताया है। उन्होंने अपने ट्वीट में कहा कि हम सभी मिलकर कांग्रेस की विचारधारा और रीति रिवाज को बड़े सशक्त तरीके से जन-जन तक पहुंचाएंगे। माना जा रहा है कि पायलट को जल्दी ही कोई बड़ी सौगात मिल सकती है। जिसके अंतर्गत उन्हें किसी भी बड़े राज्य का प्रभारी भी बनाया जा सकता है।
एमआईसीई टूरिज्म की अपार संभावनाए हैं राजस्थान में –
डॉ. रश्मि शर्मा
जयपुर पर्यटन क्षेत्र में एमआईसीई (मीटिंग इंसेंटिव्स, कॉन्फ्रेंस, एग्जिबिशन) टूरिज्म अपार संभावनाओँ से भरा है। राजस्थान में इन दिनों एमअआईसीई टूरिज्म तेज गति से बढ़ रहा है ।
पर्यटन विभाग की निदेशक डॉ.रश्मि शर्मा के अनुसार एमअआईसीई टूरिज्म, पर्यटन क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण घटक है। देशभर में वेडिंग डेस्टिनेशन के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके जयपुर, उदयपुर, व अजमेर में अंतरराष्ट्रीय स्तर के कन्वेंशन व एग्जिबिशन्स के लिए एमआईसीई सेंटर्स स्थापित किए जाने की घोषणा माननीय मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत द्वारा अपने बजट- 2023-24 के भाषण के दौरान की गई। मुख्यमंत्री श्री गहलोत द्वारा की गई यह घोषणा एमआईसीई टूरिज्म को महत्व को दर्शाती है। इन घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने का काम भी शुरू हो चुका है । इन एमआईसीई सेंटर्स स्थापित करने में ₹100-100 करोड़ रुपए की लागत आएगी । यह सेंटर्स पर्यटन क्षेत्र में राजस्थान के लिए एक और मील का पत्थर साबित होंगे । यही नहीं पर्यटन क्षेत्र में सिरमौर बनने की प्रतिबद्धता दर्शाते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसी बजट भाषण के दौरान राज्य में पर्यटन सुविधाएं विकसित करने व पर्यटन क्षेत्र में स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने एवं अधिक से अधिक देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए गठित पर्यटन विकास कोष का बजट 1500 करोड़ रुपए कर दिया, जो पूर्व में 1000 करोड़ रुपए था ।
डॉ. रश्मि शर्मा ने कहा कि एमआईसीई टूरिज्म के लिए राजस्थान पर्यटन क्षेत्र के निवेशकों और टूअर व ट्रेवल ऑपरेटर्स की पहली पसंद बनता जा रहा है अप्रेल माह में यहां पर ग्रेट इंडियन ट्रेवल बाजार-12 का आयोजन किया गया, जिसके तहत 56 देशों के 283 टूअर ऑपरेटर्स ने भाग लिया। जुलाई महीने में यहां पर राजस्थान डोमेस्टिक ट्रेवल मार्ट (आरडीटीएम) का भी आयोजन किया गया जिसमें 200 सेलर्स और इतने ही बायर्स शामिल थे। तीन महीने के भीतर जयपुर में आयोजित दो बड़े आयोजनों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजस्थान एमआईसीई टूरिज्म सैक्टर में भी अग्रणी बनने की ओर अग्रसर है ।
राजस्थान पर्यटन विभाग की निदेशक डॉ. रश्मि शर्मा के अनुसार राजस्थान में जयपुर, जोधपुर और उदयपुर सहित अजमेर,पुष्कर, भरतपुर,अलवर, जैसलमेर, बीकानेर सहित प्रदेश का शेखावाटी इलाका, कोटा, बूंदी, माउन्ट आबू , चित्तौडगढ़ समेत सवाईमाधोपुर और धौलपुर भी एमआईसीई टूरिज्म का हिस्सा बन चुके हैं क्योंकि राजस्थान पर्यटन विभाग द्वारा एमआईसीई टूरिज्म के लिए आधारभूत बुनियादी प्रभावी ढ़ांचा तैयार कर दिया गया है । परिवहन, इंटरनेट, मीटिंग हॉल, भोजन, के साथ ही पर्यटन प्रतिनिधि अपनी पसंद के अनुसार अपनी पर्यटन यात्राएं भी यहां कर सकते हैं। कुल मिलाकर राजस्थान में एमआईसीई टूरिज्म, राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय पर्यटन प्रतिनिधियों के लिए एक पूर्ण पर्यटन पैकेज उपलब्ध करवाता है क्योंकि राजस्थान पर्यटन क्षेत्र काफी विविधता लिए हुए है। डॉ. शर्मा के अनुसार राजस्थान में पर्यटन के सभी आवश्यक तत्व जैसे कि आयकोनिक स्मारक व हैरिटेज क्षेत्र, विशेष हैरिटेज गांव व शिल्पग्राम, अनुभावात्मक पर्यटन, मरूस्थलीय पर्यटन,सहासिक पर्यटन, वाइलल्डलाइफ व ईकोटूरिज्म, ट्राइबल टूरिज्म, कल्चरल टूरिज्म, क्राफ्ट व कूजिन पर्यटन, वीकएण्ड गेटवे टूरिज्म, धार्मिक टूरिज्म, वैडिंग टूरिज्म, वैलनैस टूरिज्म, (मेडीकल टूरिज्म), ग्रामीण टूरिज्म व फिल्म टूरिज्म आदि। पर्यटन के यह सभी आवश्यक तत्व राजस्थान को एमआईसीई टूरिज्म के लिए पहली पसंद बनाते हैं । डॉ. रश्मि शर्मा का कहना है कि राजस्थान में एमआईसीई टूरिज्म के द्वार इसलिए भी खुले हैं क्योंकि राजस्थान अपने विशिष्ट आत्थित्य सत्कार के लिए विशेष तौर प्रसिद्ध है। यहां पर देश के 75 फीसदी हैरिटेज होटल हैं। जो कि प्रदेश में एमआईसीई टूरिज्म फलने-फूलने में काफी मदद कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त राज्य में पर्ययकों के लिए काफी सुविधाएं हैं। एमआईसीई सेंटर्स हवाई, सड़क औऱ रेल परिवहन से जुड़े हैं। यहां पर प्रशिक्षित गाइड हैं, हिन्दी, अंग्रेजी व अन्य भाषओं के अनुवादक भी यहां पर मौजूद हैं।
प्रदेश के किस शहर में एमआईसीई टूरिज्म केंद्र
जयपुर- नव निर्मित राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर, बिरला ऑडिटोरियम, जयपुर एग्जिबिशन एण्ड कन्वेंशन सेंटर ( जेईसीसी), होटल रामबाग पैलेस, होटल जयमहल पैलेस, राजविलास पैलेस, आईटीसी राजपूताना, होटल राज पैलेस, जयपुर मैरिएट, रेडिसन ब्लू, द ट्राई़डेंट, रॉयल ऑरकिड, होटल कंट्री इन, मानसिंह पैलेस, होटल द ललित, होटल जयपुर अशोक, होटल आर्य निवास, डिग्गी पैलेस, एसएमएस कन्वेंशन सेंटर, होटल क्लार्क्स आमेर, क्राउन प्लाजा, होटल शिव विलास, होटल ली मैरेडियन व फेयरमोन्ट।
जोधपुर- उम्मेद भवन पैलेस, करणी भवन पैलेस, अजीत भवन पैलेस, बालसमंद लेक पैलेस, रणबांका पैलेस, फोर्ट चानवा, होटल पार्क प्लाजा, श्रीराम इंटरनेशनल, द गेटवे होटल, चंद्र इन, इंडियाना पैलेस, विवान्ता बॉय ताज हरि महल पैलेस।
उदयपुर- द ललित लक्ष्मी विलास, होटल इंद्र रेजीडेंसी, रमाडा उदयपुर रिसोर्ट एण्ड स्पा, द ओबेरॉय उदयविलास, फतह प्रकाश पैलेस, होटल लेक पैलेस, देवीगढ़ फोर्ट।
अजमेर व पुष्कर- होटल मान सिंह, होटल मेरवाडा पैलेस, अनंता स्पा एण्ड रिसोर्ट, आरामबाग पैलेस, द पुष्कर बाग, भंवरसिंह पैलेस, गेटवे रिसोर्ट, वैलकम हैरिटेज खींवसर फोर्ट नागौर।
भरतपुर व अलवर- होटल उदयविलास, होटल द बाग, होटल लक्ष्मी विलास पैलेस, होटल कदम्बकुंज, दधिकार फोर्ट व द सरिस्का पैलेस।
जैसलमेर- फोर्ट रजवाड़ा, सूर्यगढ़. गोरबंद पैलेस, ब्रायस फोर्ट व डेजर्ट ट्यूलिप होटल एण्ड रेस्टोरेंट।
शेखावाटी व बीकानेर- द डेजर्ट रिसोर्ट, होटल कैसल मंडावा, अलसीसर महल, होटल लालगढ़ पैलेस, होटल लक्ष्मी निवास पैलेस व होटल बसंत विहार पैलेस।
कोटा व बूंदी- द ग्रेंड चांदीराम, होटल मीनल रेजीडेंसी, आईटीसी समूह का उम्मेद भवन, हाडौती पैलेस।
माउन्ट आबू व चित्तौडगढ़- होटल बीकानेर पैलेस, होटल पालनपुर पैलेस, होटल हिललॉक, होटल हिल्टन, होटल अरण्या हिल रिसोर्ट, होटल शिखर आरटीडीसी, होटल पद्मिनी।
सवाईमाधोपुर व धौलपुर- रणथम्भौर फॉरेस्ट रिसोर्ट, होटल राज पैलेस, नाहरगढ़ रणथम्भौर व राजनिवास
भाजपा आईटी सैल-
अंतिम छोर के स्मार्ट फोन यूजर मतदाता तक पहुंचना ही लक्ष्य
जयपुर।
राजस्थान भाजपा की आईटी सैल इन दिनों समाज के अंतिम छोर के मतदाता तक पहुंचने में लगी है। आई टी सैल का सहारा स्मार्ट फोन का उपयोग करने वाले मतदाता है। सूत्रों का तो यह भी कहना है कि गहलोत सरकार की ओर से वितरित किए स्मार्ट फोन भी भाजपा की आईटी सैल की अप्रत्यक्ष रूप से मदद ही करेंगे।
आईटी सैल के प्रदेश संयोजक धनराज सोलंकी के अनुसार प्रदेश भाजपा की आईटी सैल केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और राजस्थान कांग्रेस की नाकामियों को व्हाट्सएप्प ग्रुप के जरिए मतदाताओं तक पहुंचाने में जुटी हैं। बूथ स्तर पर आईटी सैल के 60000 से अधिक व्हाट्सएप्प ग्रुप बने हैं जिनके जरिए मतदाताओं का रुझान भाजपा की ओर करने के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।
सोलंकी के अनुसार प्रदेश भाजपा सैल एक सप्ताह के भीतर के मोबाइल एप्प लॉन्च करने की तैयारी में है जिसके जरिए आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतें संबंधित सरकारी वैबसाइट पर भी कर सकेंगे। वोटर हैल्प लाइन के तौर पर इस एप्प को डिजाइन किया गया है।
गौरतलब है कि इस बार भाजपा की आईटी सैल का प्रमुख केंद्र बिन्दू भ्रामक और झूठी खबरों व वीडियो को रोकने पर भी रहेगा। सूत्रों का कहना है कि आईटी सैल इस दिशा में भी काम कर रही है कि तथ्यात्मक रूप से सही खबरें ही मतदाताओं तक पहुंचे।
धनराज सोलंकी के अनुसार प्रदेश भाजपा मुख्यालय में आईटी प्रशिक्षित व्यक्तियों की टी काम कर रही है, जिसमें 18 जनें शामिल हैं वहीं पूरे प्रदेश भर में 45 से अधिक सदस्यों की टीम संभाग स्तर आईटी सैल का काम संभाल रही है।
उन्होंने बताया कि एक सप्ताह के भीतर लॉन्च की जाने वाली एप्प का प्रमुख फीचर यह भी होगा की मतदाता अपनी वोटर लिस्ट देख सके, उसके पास अपने बूथ की पूरी जानकारी हो साथ ही आचार संहिता पालन और उल्लंघन के बारे में भी मतदाता को जानकारी मिल सके
Sunday, May 30, 2010
face book ke chaar baap
मार्क जुकेरबर्ग, डस्टिन मोस्कोविट्ज,क्रिस ह्यूजस और एडयूराडो सेवरियन ने मिलकर फेसबुक की कल्पना की। यह चारों दोस्त एक साथ एक ही कमरे में रहते थे और मार्क जुकेरबर्ग की मूल सोच को आगे बढ़ाने में साथ देते रहे। मार्क ने फेसबुक का नाम अपने बचपन की यादों के जखीरे में से निकाला। मार्क जब प्रेप क्लास में पढ़ रहे थे तो उनके स्कूल में एक छोटी सी किताब दी जाती थी जिसमें स्कूल में पढ़ रहे सारे छात्र-छात्राओं की जानकारियां थीं। इसे आम बोलचाल में फेसबुक कहा जाता था और यहीं से आज के स्वरूप वाली फेस बुक की कल्पना की गई। चारों दोस्तों के जीवन में झांकने से पता चलता है कि शुरूआत में यह चारों दोस्त एक साथ फेसबुक के बारे में सोचा करते थे और उसके बाद जैसे-जैसे सफलता मिलती गई वैसे-वैसे यह चारों दोस्त एक दूसरे से अलग होते गए और चार दोस्त चार दिशाओं जैसे हो गए। फेसबुक इन चार दोस्तों का ऎसा काम है कि भले ही इनके रास्ते अलग हो गए हों, फेसबुक के नाम के साथ इन चार व्यक्तियों का नाम हमेशा जुड़ा रहेगा।
आधुुनिक युग में दुनियाभर के मुद्दों पर बेबाक राय रखने के लिए आम आदमी आगे आ रहा है। देश, दुनिया और स्वयं के अंदर उठ रहे सवालों को दूसरों के साथ बांटना और दूसरों को राय देना, उनकी सुनना और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सोच बनाना। यह सब आसान है। हम खुश हैं क्योंकि हमने दूसरों के गम और खुशियां बांटी हैं। यह सब हुआ है सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक से। फेसबुक पर कितने ही लोग हैं जो एक दूसरे के जीवन में ताक-झांक कर रहे हैं और अनजानों को अपना दोस्त बनाते हुए हर छोटी से छोटी बात को दूसरे के साथ बांटते हैं। संचार क्रांति के इस युग में फेसबुक ने वह कर दिखाया है जो अन्तरराष्ट्रीय स्तर के नेता और उनकी नीतियां नहीं कर सकीं। दुनिया में भाईचारे की भावना को फै लाने में अव्वल फेसबुक के जन्मदाताओं ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी फेसबुक एक दिन ऎसा स्वरूप लेगी। २००४ से लेकर आज २०१० में मात्र छह साल के काल में फेसबुक एक बड़ा नाम हो चुकी है।
इसकी कामयाबी इस और ओर संकेत करती है कि रचनात्मक माहौल और काम को करने की आजादी अगर आपको दी जाए तो कल्पनाओं को साकार होते और पंख लगते देर नहीं लगती। जीता-जागता उदाहरण फेसबुक के रूप में सभी के सामने हैं। दुनिया भर में फेसबुक के ४० करोड़ प्रयोगकर्ता हैं और इनमें से सत्तर प्रतिशत अमेरिका के बाहर के हैं। भारत के लिए भी सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक नई बात नहीं है। यहां के लोग भी इससे जुड़ना चाहते हैं और इसके जरिए वह संपर्क करना चाहते हैं, मशहूर और नामी गिरामी हस्तियों तक जिनके बारे में सिर्फ पढ़ने और सुनने को मिलता था, उन्हीं हस्तियों को भारत की जनता क्या अच्छा है और क्या बुरा समझाती है। फिल्मी सितारे भी जनता तक पहुंचने के लिए फेसबुक का सहारा ले रहे हैं। कई देशों में इस साइट पर प्रतिबंध भी लगे लेकिन सारी सरहदों को तोड़ते हुए फेसबुक ने वैश्विक स्तर पर क्रांति की है उसका मुकाबला नहीं है। कई सवाल भी उठते हैं कि फेसबुक को यौन अपराधियों से दूर रखने के लिए साइट क्या कर रही है। क्रिस हग्स कहते हैं कि फेसबुक सूचना पर प्रयोगकर्ता को पूरा नियंत्रण देती है। फेसबुक का उपयोग करते समय सावधान रहना चाहिए कि हम किस बारे में बात कर रहे हैं, जितना हम खुद को सिखाएंगे, उससे भी ज्यादा हमें अपने बच्चों को सिखाना होगा, इससे हमारा समाज मजबूत बनेगा।
मार्क जुकेरबर्ग
२६ साल की आयु में मार्क दुनिया के सबसे युवा अरबपतियों में से एक हैं। यहूदी परिवार में जन्मे मार्क का अब युवा होने पर कि सी भी धर्म में विश्वास नहीं है। स्कूल के दिनों से ही मार्क ने प्रोग्रामिंग करना शुरू कर दिया था। उनका लालन-पालन न्यूयॉर्क जैसे शहर में हुआ। संगीत के शौकीन मार्क ने अपने शुरूआती दिनों में ही अपने पिता के दोस्तों के लिए कुछ प्रोग्राम तैयार किए। हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के बाद मार्क के दिमाग में यूनिवर्सिटी कैम्पस के लोगों के लिए एक प्रोग्राम बनाने का विचार आया और फेसबुक की परिकल्पना बनाई गई। शुरूआत में यह केवल हॉवर्ड यूनिवर्सिटी कैम्पस के छात्र-छात्राओं के लिए थी। २००७ में फेसबुक एक सोशल नेटवर्किग साइट के रूप में सामने आई और आज की तारीख में पूरी दुनिया में करीब आठ लाख लोग फेसबुक के लिए प्रोग्रामिंग करने में लगे हुए हैं। द सोशल नेटवर्क के नाम से मार्क जुकेरबर्ग और उनके साथियों पर एक फिल्म भी बनी है जो कि २०१० के अंत कर प्रदर्शित होगी। इस फिल्म में जस्टिन टिम्बरलेक मुख्य भूमिका में हैं।
एडुआर्डो सेवरियन
ब्राजील में पैदा हुए सेवरियन नब्बे के दशक में मियामी आ गए थे, वे भी हावर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रतिभाशाली छात्र थे और पढ़ाई पूरी होते-होते वह फेसबुक अभियान में जुट गए थे। फेसबुक से एडुआर्डो सेवरियन अलग हो गए क्योंकि समय के साथ उनके और मुख्य संस्थापक मार्क जुकेरबर्ग के बीच गहरे वैचारिक मतभेद पैदा हो गए थे। धीरे-धीरे सेवरियन का प्रभाव भी फेसबुक में हर स्तर पर खत्म होता जा रहा था, आखिरकार सेवरियन ने कानूनी लड़ाई लड़ी और इसका नतीजा यह हुआ उन्हें फेसबुक में सह-संस्थापक का दर्जा दे दिया गया, जो फेसबुक के इतिहास में दर्ज रहेगा।
क्रिस हग्स
क्रिस हग्स का जन्म उत्तरी कोरोलिना में २६ नवंबर १९८३ को हुआ, क्रिस को भी फेसबुक का सह-संस्थापक माना जाता है। हावर्ड से इतिहास और साहित्य की पढाई करने वाले क्रिस फेसबुक के ऑनलाइन प्रवक्ता के रूप में कार्य करते थे। उन्हें फेसबुक से अलग पहचान उस समय मिली जब उन्होंने बराक हुसैन ओबामा के लिए ऑनलाइन प्रचार कार्यक्रम बनाया। कहा भी जाता है कि बराक कि जीत में इंटरनेट और क्रिस ह्यूजस का बड़ा योगदान है। क्रिस इस समय अमेरिका में बड़े उद्योगपतियों में शुमार किए जाते हैं। उनके बारे में खास बात यह भी है कि वे घोषित रूप से समलैंगिक हैं।
डस्टिन मोस्कोविट्ज
वाशिंगटन डीसी में पैदा हुए डस्टिन मोस्कोविट्ज ने हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ने के लिए दाखिला लिया और बाद में वह पाल आल्टो चले गए फेसबुक अभियान के लिए। डस्टिन ने फेसबुक में अच्छा खासा योगदान दिया और उसके बाद उन्होंने खुद की एक नई कंपनी शुरू कर दी। डस्टिन के फेसबुक से हटते ही कंपनी से काफी लोगों ने अलविदा कहना शुरू कर दिया, लेकिन जल्द ही फेसबुक के सीईओ मार्क जुकेरबर्ग को कहना पड़ा कि डस्टिन हमेशा फेसबुक के हमेशा से शुभचिंतक हैं और रहेंगे। मार्क ने यह भी कहा कि उन्हें जब भी सलाह लेनी होगी तो वह डस्टिन से ही सलाह लेंगे।
आधुुनिक युग में दुनियाभर के मुद्दों पर बेबाक राय रखने के लिए आम आदमी आगे आ रहा है। देश, दुनिया और स्वयं के अंदर उठ रहे सवालों को दूसरों के साथ बांटना और दूसरों को राय देना, उनकी सुनना और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सोच बनाना। यह सब आसान है। हम खुश हैं क्योंकि हमने दूसरों के गम और खुशियां बांटी हैं। यह सब हुआ है सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक से। फेसबुक पर कितने ही लोग हैं जो एक दूसरे के जीवन में ताक-झांक कर रहे हैं और अनजानों को अपना दोस्त बनाते हुए हर छोटी से छोटी बात को दूसरे के साथ बांटते हैं। संचार क्रांति के इस युग में फेसबुक ने वह कर दिखाया है जो अन्तरराष्ट्रीय स्तर के नेता और उनकी नीतियां नहीं कर सकीं। दुनिया में भाईचारे की भावना को फै लाने में अव्वल फेसबुक के जन्मदाताओं ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी फेसबुक एक दिन ऎसा स्वरूप लेगी। २००४ से लेकर आज २०१० में मात्र छह साल के काल में फेसबुक एक बड़ा नाम हो चुकी है।
इसकी कामयाबी इस और ओर संकेत करती है कि रचनात्मक माहौल और काम को करने की आजादी अगर आपको दी जाए तो कल्पनाओं को साकार होते और पंख लगते देर नहीं लगती। जीता-जागता उदाहरण फेसबुक के रूप में सभी के सामने हैं। दुनिया भर में फेसबुक के ४० करोड़ प्रयोगकर्ता हैं और इनमें से सत्तर प्रतिशत अमेरिका के बाहर के हैं। भारत के लिए भी सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक नई बात नहीं है। यहां के लोग भी इससे जुड़ना चाहते हैं और इसके जरिए वह संपर्क करना चाहते हैं, मशहूर और नामी गिरामी हस्तियों तक जिनके बारे में सिर्फ पढ़ने और सुनने को मिलता था, उन्हीं हस्तियों को भारत की जनता क्या अच्छा है और क्या बुरा समझाती है। फिल्मी सितारे भी जनता तक पहुंचने के लिए फेसबुक का सहारा ले रहे हैं। कई देशों में इस साइट पर प्रतिबंध भी लगे लेकिन सारी सरहदों को तोड़ते हुए फेसबुक ने वैश्विक स्तर पर क्रांति की है उसका मुकाबला नहीं है। कई सवाल भी उठते हैं कि फेसबुक को यौन अपराधियों से दूर रखने के लिए साइट क्या कर रही है। क्रिस हग्स कहते हैं कि फेसबुक सूचना पर प्रयोगकर्ता को पूरा नियंत्रण देती है। फेसबुक का उपयोग करते समय सावधान रहना चाहिए कि हम किस बारे में बात कर रहे हैं, जितना हम खुद को सिखाएंगे, उससे भी ज्यादा हमें अपने बच्चों को सिखाना होगा, इससे हमारा समाज मजबूत बनेगा।
मार्क जुकेरबर्ग
२६ साल की आयु में मार्क दुनिया के सबसे युवा अरबपतियों में से एक हैं। यहूदी परिवार में जन्मे मार्क का अब युवा होने पर कि सी भी धर्म में विश्वास नहीं है। स्कूल के दिनों से ही मार्क ने प्रोग्रामिंग करना शुरू कर दिया था। उनका लालन-पालन न्यूयॉर्क जैसे शहर में हुआ। संगीत के शौकीन मार्क ने अपने शुरूआती दिनों में ही अपने पिता के दोस्तों के लिए कुछ प्रोग्राम तैयार किए। हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के बाद मार्क के दिमाग में यूनिवर्सिटी कैम्पस के लोगों के लिए एक प्रोग्राम बनाने का विचार आया और फेसबुक की परिकल्पना बनाई गई। शुरूआत में यह केवल हॉवर्ड यूनिवर्सिटी कैम्पस के छात्र-छात्राओं के लिए थी। २००७ में फेसबुक एक सोशल नेटवर्किग साइट के रूप में सामने आई और आज की तारीख में पूरी दुनिया में करीब आठ लाख लोग फेसबुक के लिए प्रोग्रामिंग करने में लगे हुए हैं। द सोशल नेटवर्क के नाम से मार्क जुकेरबर्ग और उनके साथियों पर एक फिल्म भी बनी है जो कि २०१० के अंत कर प्रदर्शित होगी। इस फिल्म में जस्टिन टिम्बरलेक मुख्य भूमिका में हैं।
एडुआर्डो सेवरियन
ब्राजील में पैदा हुए सेवरियन नब्बे के दशक में मियामी आ गए थे, वे भी हावर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रतिभाशाली छात्र थे और पढ़ाई पूरी होते-होते वह फेसबुक अभियान में जुट गए थे। फेसबुक से एडुआर्डो सेवरियन अलग हो गए क्योंकि समय के साथ उनके और मुख्य संस्थापक मार्क जुकेरबर्ग के बीच गहरे वैचारिक मतभेद पैदा हो गए थे। धीरे-धीरे सेवरियन का प्रभाव भी फेसबुक में हर स्तर पर खत्म होता जा रहा था, आखिरकार सेवरियन ने कानूनी लड़ाई लड़ी और इसका नतीजा यह हुआ उन्हें फेसबुक में सह-संस्थापक का दर्जा दे दिया गया, जो फेसबुक के इतिहास में दर्ज रहेगा।
क्रिस हग्स
क्रिस हग्स का जन्म उत्तरी कोरोलिना में २६ नवंबर १९८३ को हुआ, क्रिस को भी फेसबुक का सह-संस्थापक माना जाता है। हावर्ड से इतिहास और साहित्य की पढाई करने वाले क्रिस फेसबुक के ऑनलाइन प्रवक्ता के रूप में कार्य करते थे। उन्हें फेसबुक से अलग पहचान उस समय मिली जब उन्होंने बराक हुसैन ओबामा के लिए ऑनलाइन प्रचार कार्यक्रम बनाया। कहा भी जाता है कि बराक कि जीत में इंटरनेट और क्रिस ह्यूजस का बड़ा योगदान है। क्रिस इस समय अमेरिका में बड़े उद्योगपतियों में शुमार किए जाते हैं। उनके बारे में खास बात यह भी है कि वे घोषित रूप से समलैंगिक हैं।
डस्टिन मोस्कोविट्ज
वाशिंगटन डीसी में पैदा हुए डस्टिन मोस्कोविट्ज ने हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ने के लिए दाखिला लिया और बाद में वह पाल आल्टो चले गए फेसबुक अभियान के लिए। डस्टिन ने फेसबुक में अच्छा खासा योगदान दिया और उसके बाद उन्होंने खुद की एक नई कंपनी शुरू कर दी। डस्टिन के फेसबुक से हटते ही कंपनी से काफी लोगों ने अलविदा कहना शुरू कर दिया, लेकिन जल्द ही फेसबुक के सीईओ मार्क जुकेरबर्ग को कहना पड़ा कि डस्टिन हमेशा फेसबुक के हमेशा से शुभचिंतक हैं और रहेंगे। मार्क ने यह भी कहा कि उन्हें जब भी सलाह लेनी होगी तो वह डस्टिन से ही सलाह लेंगे।
Friday, May 28, 2010
hollywood
हॉलीवुड बचा बॉलीवुड की स्टाइल में
हॉलीवुड नष्ट होने से बच गया। हॉलीवुड भेंट चढऩे वाला था कुछ भू-व्यवसायियों के हत्थे।
जागरुक लोगों ने हॉलीवुड को आखिर बचा लिया। मशहूर अंग्रेजी मैगजीन प्लेब्वॉय के मालिक ह्यू हेफऩर ने दरियादिली दिखाई और एक ऐसी दुनिया के प्रतीक को नष्ट होने से बचा लिया जिसका अनुसरण सारी दुनिया करना चाहती है और उसका हिस्सा बनना चाहती है।
हॉलीवुड अमेरिका की फिल्मी दुनिया। हॉलीवुड के बारे में कहा जाए तो सिर्फ इतना की नाम ही काफी है। ऐसे में हॉलीवुड को पहचान देने वाले हॉलीवुड प्रतीक चिन्ह को नष्ट कर देना दुनिया के लाखों लोगों के सपनों की हत्या कर देने के बराबर था। जिसका अंदेशा अमरिका के भू-व्यवसायियों को भी था। ऐसे में सामने आए कुछ ऐसे लोग जिन्हें हॉलीवुड की हस्ती कहा जाता है और एक विश्व प्रसिद्ध धरोधर एक प्रतीक चिन्ह को बचा लिया गया।
एक प्रतीक चिन्ह के लिए ऐसी चिंता बड़ी बात है और यह भी दर्शाती है कि आपका विश्वास अपनी धरोहर को सहेजने में कितना है। हॉरर, सस्पेंस,रोमांस और रोमांच जो कि हॉलीवुड सिनेमा का अनिवार्य अंग होते हैं वैसा ही लॉस एंजिल्स की माउंट ली की पहाड़ी पर स्थित हॉलीवुड के प्रतीक चिन्ह को बचाने के लिए की गई कवायद में देखने को मिला। कहानी सारी फिल्मी है कि तर्ज पर हॉलीवुड के प्रतीक चिन्ह को बचाया गया बॉलीवुड की मसाला और हैप्पी एंड वाली फिल्मों की स्टाइल में। कहते हैं ना फिल्मी दुनिया की चमक दमक और लीपे पुते चेहरों के पीछे कितनी उदासी छिपी होती है हर कोई नहीं समझ सकता। ऐसा ही कुछ हुआ हॉलीवुड की दुनिया में। सारी दुनिया में मुहिम छिड़ी रही कि कैसे बचाए हॉलीवुड को फिर बगल में छोरा और शहर में ढिढ़ोरा की कहावत को चरितार्थ करते हुए एक शख्स बाहर निकले और उन्होंने हॉलीवुड ट्रस्ट को दान दिया जिससे बच गया हॉलीवुड। एक आम भारतीय फिल्म की स्टोरी लेकिन भावनाओं से ओत-प्रोत इसी भावना के कारण बचा हॉलीवुड का प्रतीक चिन्ह। कहानी कुछ इस तरह है कि लॉस एंजिल्स की पहाडिय़ों पर 1923 में माउंट ली की पहाड़ी पर एक रियल स्टेट डेवलपर कंपनी ने इस श्रेत्र में आवासीय मकान बनाने के लिए एक विज्ञापन तैयार किया हॉलीवुड लैंड के नाम से । यह साइन बोर्ड लगाया गया और फिर अमेरिकी सिनेमा की प्रगति के साथ ही इसे हॉलीवुड कर दिया गया। दरअसल, हॉलीवुड के इस प्रतीक पर शहर का अधिकार है लेकिन इसके आस-पास की संपत्ति पर शिकागो की एक निवेश कंपनी का अधिकार है। शिकागो की इस निवेश कंपनी को प्रतीक चिन्ह के आस-पास की 138 एकड़ जमीन पर आवास बनाने थे लेकिन वह इस बात पर भी राजी थे कि अगर हॉलीवुड प्रतीक चिन्ह की देखरेख करने वाला ट्रस्ट इस कंपनी को एक करोड़ पच्चीस लाख डॉलर दे दे तो वह इस जमीन को ट्रस्ट के नाम कर देंगे। यहीं से शुरु हुआ पैसा एकत्र करने की कवायद । अमेरिका के 50 राज्य और दुनिया के करीब दस देश इस मुहिम में लग गए कि कैसे भी करके एक करोड़ पच्चीस लाख डॉलर शिकागो की कंपनी को देने हैं। 45 फीट उंचे और 350 फुट की लंबाई वाले हॉलीवुड प्रतीक चिन्ह को ढक दिया गया और उस पर लिखा गया, सेव द पीक, सेव द साइन ऑव हॉलीवुड। 1978 में इस प्रतीक चिन्ह की दुबारा मरम्मत की गई थी और इसे पूरा स्टील से बनाया गया जिसके वास्तुकार थे रिचर्ड हिर गॉफ। दुनिया में फैली इस चिंता में दुनिया के बड़े फिल्मकार,कलाकार और उद्योगपति जुट गए। इसके लिए टॉम हैंक्स और निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग जैसी हस्तियों ने भी दान दिया फिर भी नौ लॉख डॉलर कम पड़े तो मशहूर पत्रिका प्लेब्वॉय के मालिक ह्यू हे$फनर ने दान दिया और हॉलीवुड का प्रतीक चिन्ह नष्ट होने से बच गया। ह्यू हेफऩर ने 1978 में भी इस प्रतीक चिन्ह की मरम्मत के लिए दान दिया और एक बार फिर वे हॉलीवुड के लिए तारणहार बन कर आए। ह्यू हेफऩर ने कहा कि उनके लिए हॉलीवुड का प्रतीक चिन्ह एफिल टावर के समान है और उनके सारे सपने और कल्पनाएं हॉलीवुड के कारण आई। जिसका स्पष्य प्रभाव उनकी पत्रिका प्लेब्वॉय में देखने को मिलता है। : नभय:
हॉलीवुड नष्ट होने से बच गया। हॉलीवुड भेंट चढऩे वाला था कुछ भू-व्यवसायियों के हत्थे।
जागरुक लोगों ने हॉलीवुड को आखिर बचा लिया। मशहूर अंग्रेजी मैगजीन प्लेब्वॉय के मालिक ह्यू हेफऩर ने दरियादिली दिखाई और एक ऐसी दुनिया के प्रतीक को नष्ट होने से बचा लिया जिसका अनुसरण सारी दुनिया करना चाहती है और उसका हिस्सा बनना चाहती है।
हॉलीवुड अमेरिका की फिल्मी दुनिया। हॉलीवुड के बारे में कहा जाए तो सिर्फ इतना की नाम ही काफी है। ऐसे में हॉलीवुड को पहचान देने वाले हॉलीवुड प्रतीक चिन्ह को नष्ट कर देना दुनिया के लाखों लोगों के सपनों की हत्या कर देने के बराबर था। जिसका अंदेशा अमरिका के भू-व्यवसायियों को भी था। ऐसे में सामने आए कुछ ऐसे लोग जिन्हें हॉलीवुड की हस्ती कहा जाता है और एक विश्व प्रसिद्ध धरोधर एक प्रतीक चिन्ह को बचा लिया गया।
एक प्रतीक चिन्ह के लिए ऐसी चिंता बड़ी बात है और यह भी दर्शाती है कि आपका विश्वास अपनी धरोहर को सहेजने में कितना है। हॉरर, सस्पेंस,रोमांस और रोमांच जो कि हॉलीवुड सिनेमा का अनिवार्य अंग होते हैं वैसा ही लॉस एंजिल्स की माउंट ली की पहाड़ी पर स्थित हॉलीवुड के प्रतीक चिन्ह को बचाने के लिए की गई कवायद में देखने को मिला। कहानी सारी फिल्मी है कि तर्ज पर हॉलीवुड के प्रतीक चिन्ह को बचाया गया बॉलीवुड की मसाला और हैप्पी एंड वाली फिल्मों की स्टाइल में। कहते हैं ना फिल्मी दुनिया की चमक दमक और लीपे पुते चेहरों के पीछे कितनी उदासी छिपी होती है हर कोई नहीं समझ सकता। ऐसा ही कुछ हुआ हॉलीवुड की दुनिया में। सारी दुनिया में मुहिम छिड़ी रही कि कैसे बचाए हॉलीवुड को फिर बगल में छोरा और शहर में ढिढ़ोरा की कहावत को चरितार्थ करते हुए एक शख्स बाहर निकले और उन्होंने हॉलीवुड ट्रस्ट को दान दिया जिससे बच गया हॉलीवुड। एक आम भारतीय फिल्म की स्टोरी लेकिन भावनाओं से ओत-प्रोत इसी भावना के कारण बचा हॉलीवुड का प्रतीक चिन्ह। कहानी कुछ इस तरह है कि लॉस एंजिल्स की पहाडिय़ों पर 1923 में माउंट ली की पहाड़ी पर एक रियल स्टेट डेवलपर कंपनी ने इस श्रेत्र में आवासीय मकान बनाने के लिए एक विज्ञापन तैयार किया हॉलीवुड लैंड के नाम से । यह साइन बोर्ड लगाया गया और फिर अमेरिकी सिनेमा की प्रगति के साथ ही इसे हॉलीवुड कर दिया गया। दरअसल, हॉलीवुड के इस प्रतीक पर शहर का अधिकार है लेकिन इसके आस-पास की संपत्ति पर शिकागो की एक निवेश कंपनी का अधिकार है। शिकागो की इस निवेश कंपनी को प्रतीक चिन्ह के आस-पास की 138 एकड़ जमीन पर आवास बनाने थे लेकिन वह इस बात पर भी राजी थे कि अगर हॉलीवुड प्रतीक चिन्ह की देखरेख करने वाला ट्रस्ट इस कंपनी को एक करोड़ पच्चीस लाख डॉलर दे दे तो वह इस जमीन को ट्रस्ट के नाम कर देंगे। यहीं से शुरु हुआ पैसा एकत्र करने की कवायद । अमेरिका के 50 राज्य और दुनिया के करीब दस देश इस मुहिम में लग गए कि कैसे भी करके एक करोड़ पच्चीस लाख डॉलर शिकागो की कंपनी को देने हैं। 45 फीट उंचे और 350 फुट की लंबाई वाले हॉलीवुड प्रतीक चिन्ह को ढक दिया गया और उस पर लिखा गया, सेव द पीक, सेव द साइन ऑव हॉलीवुड। 1978 में इस प्रतीक चिन्ह की दुबारा मरम्मत की गई थी और इसे पूरा स्टील से बनाया गया जिसके वास्तुकार थे रिचर्ड हिर गॉफ। दुनिया में फैली इस चिंता में दुनिया के बड़े फिल्मकार,कलाकार और उद्योगपति जुट गए। इसके लिए टॉम हैंक्स और निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग जैसी हस्तियों ने भी दान दिया फिर भी नौ लॉख डॉलर कम पड़े तो मशहूर पत्रिका प्लेब्वॉय के मालिक ह्यू हे$फनर ने दान दिया और हॉलीवुड का प्रतीक चिन्ह नष्ट होने से बच गया। ह्यू हेफऩर ने 1978 में भी इस प्रतीक चिन्ह की मरम्मत के लिए दान दिया और एक बार फिर वे हॉलीवुड के लिए तारणहार बन कर आए। ह्यू हेफऩर ने कहा कि उनके लिए हॉलीवुड का प्रतीक चिन्ह एफिल टावर के समान है और उनके सारे सपने और कल्पनाएं हॉलीवुड के कारण आई। जिसका स्पष्य प्रभाव उनकी पत्रिका प्लेब्वॉय में देखने को मिलता है। : नभय:
Thursday, May 27, 2010
save tiger
पेट की आग के लिए इंसान भी जानवर बन जाता है फिर बाघ तो असल में ही जानवर है
देश भर में घट रहे बाघों के लिए इन दिनों टेलीविजन पर एक मुहिम छिड़ी हुई है। एक विज्ञापन के जरिए बताया जा रहा है कि देश में केवल 1411 बाघ बचे हैं और इन्हें बचाने के लिए एसएमएस कीजिए। क्यों किसी के मन मस्तिकष में यह सवाल नहीं उठता की, क्या केवल संदेश भेजने मात्र से ही बाघों को बचाया जा सकता है? यह अलग बात है कि इतने सालों से सिर्फ संदेश भेजते रहने के ही कारण आज हमारा राष्ट्रीय पशु बाघ यानि टाईगर इतनी दयनीय स्थिति में आ गया है कि उसे बचाने के लिए चारों ओर हाहाकार मचा है। बाघ को बचाने के लिए क्या किया जाए यह समझने के लिए जंगलों की खाक छाननी होती है और जानवरों और जंगल के आस-पास रहने वालों के व्यवहार का अध्ययन करना होता है। आज वन विभाग का कोई भी अधिकारी जंगलों के कितना नजदीक है यह इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाघों की संख्या घटती जाती है और किसी को कानों कान तक खबर नहीं होती। खैर, हकीकत यह है कि बाघ लुप्त हो रहा है देश से भी और राजस्थान से भी। राजस्थान बाघों के लिए रियासतकालीन समय में उत्तम स्थान था। पर्यावरणविदें की राय में बाघ के खत्म होने का अर्थ है संपूर्ण ईको सिस्टम का खत्म होना। अगर किसी जंगल में बाघ है तो मान लेना चाहिए कि उस क्षेत्र का पारिस्थितिक तंत्र बहुत ही अच्छा है। सीधा सा अर्थ है कि जंगल बचेगा तो बाघ बचेगा। जंगल और बाघ एक दूसरे के पूरक हैं लेकिन इन दिनों सभी को एक ही चिंता है कि सेव टाईगर यानि बाघ बचाओ। सीधी सी गणित है बाघ के लिए आदर्श पस्थितियां तैयार करो और बाघ के शावकों की अठखेलियां देखो लेकिन जंगल और पर्यावरण बचाने की दिशा में क्या काम हो रहा है वो केवल फाइलों में ही है। देश में केवल 1411 बाघ हैं और राजस्थान में मात्र 41। सवाईमाधोपुर के रणथम्भौर को बाघों के लिए पहचाना जाता है। सरिस्का भी कुछ दिनों पहले तक बाघ के लिए ही मशहूर था लेकिन एक एक करके सारे बाघों का शिकार हो गया या फिर वे कालकलवित हो गए। क्या किसी अफसर को इसके लिए दोषी ठहराया गया शायद नहीं। क्योंकि तब तक किसी को बाघ के मरने से फर्क नहीं पड़ता था। अब जब सारे मारे गए तो लोगों को चिंता सता रही है। जानकारों की राय में सरिस्का में जिन तीन बाघों को ले जा कर बसाया गया है एक शरणार्थी शिविर की भांति वह कितना सफल होता है यह शायद दस से बीस साल में पता चले। दुनिया में बाघ की आठ प्रजातियां पाई जाती थी। जिनमें से तीन तो समाप्त हो चुकी हैं और पांच बची हैं। कैस्पियन टाईगर,चाइनीज टाइगर,जर्मन टाईगर, साइबेरियन टाईगर, सुमात्रा टाईगर,साउथ चाइनीज टाईगर,जावा टाईगर और इंडियन टाईगर नामक प्रजातियां थी और जिनमें से कैस्पियन टाईगर,चाइनीज टाइगर,जर्मन टाईगर तो लुप्त ही हो चुके हैं।
जानकारों की राय में राजस्थान में बाघों का लुप्त होने का कारण जंगलों का घटना है। जब राजस्थान का गठन हुआ उस समय प्रदेश के जंगलों की अंधाधुंध कटाई हुई। 1972 में जब प्रोजेक्ट टाईगर अस्तित्व में आया तब तक वन विभाग के सामने खत्म हो रहे जंगलों को बचाना एक मात्र उद्देश्य था। उस समय जंगलों को बचाने के लिए वन विभाग द्वारा एक ही प्रजाति के वृक्षों को रोप कर जंगल बचाने की कवायद की गई। लगभग मैदानों में तब्दील होते जंगलों को बचाने के लिए अकेशिया टोरटलिस(इजरायली बबूल),जूलीफलोरा(विलायती बबूल),शीशम और सफेदा सहित कुछ अन्य प्रजातियों के वृक्षों को लगाया गया। इससे हरियाली तो मिली लेकिन चारा और घास खत्म हो गई। साफतौर पर जंगल का त्रि-स्तरीय ढांचा बिगड़ गया। जिसका सीधा असर सरीसर्प वर्ग, खरगोश, सियार, लोमड़ी और सांभर, चीतल और हिरणों आदी पर पड़ा। खाने की कमी के कारण इनकी वंशवृद्धि भी कम होती गई और बाघ को अपने स्वादिष्ट भोजन से महरूम होना पड़ा। बाघों के लुप्त होने के पीछे यह भी एक बहुत बड़ा कारण है कि एन्टीलोब्स(सांभर, चीतल और हिरण आदी) खत्म होगए।
इस बात की सत्यता इसी बात से सामने आ जाती है कि प्रदेश के वन मंत्री ने दिल्ली एक पत्र लिखकर दिल्ली के चिडिय़ाघर और आस पास अधिक हो चुके एन्टीलोब्स को राजस्थान भेजने की मांग की है जिससे की सरिस्का में बाघों के पुनर्वास में दिक्कत नहीं आए।
राजस्थान की खासियत है कि यहां आज तक आदमखोर बाघ नहीं हुआ और राजस्थान के जंगलों में जितना नजदीक से बाघ को देखा जा सकता है वह देश में ओर कहीं नहीं है। बाघ की वंशवृद्धि पूरे साल की जा सकती है अगर आदर्श परिस्थितियां होतो लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। सवाईमाधोपुर में केवल रणथम्भौर पर सभी का ध्यान है लेकिन मानसिंह सेंचुरी, रामगढ़ अभ्यारण्य और कैलादेवी के जंगलों पर किसी की नजर नहीं। इसी प्रकार अलवर से होते हुए बाघों के प्रिय स्थान डिगौता,जमवारामगढ़,नाहरगढ़ और मायला बाग की ओर कोई नहीं देख रहा। ऐसे ही हाड़ौती क्षेत्र में दर्रा और उससे लगते हुए वन्य क्षेत्र में सांभर, चीतल और हिरण क्यों नहीं बढ़ाए जा रहे । कॉरिडोर विकसित होते तो बाघ नहीं मरते क्योंकि भोजन के साथ साथ पानी की कमी झेल रहे बाघ अपने क्षेत्र से बाहर आते हैं शिकारियों या फिर किसानों और पशुपालकों द्वारा संगठित होकर मार दिए जाते हैं। ऐसे में कैसे बचे बाघ। सदाबाहर, आद्र्र,पतझड़ और तराई क्षेत्रों के वनों में पाया जाना वाला टाईगर एक अच्छा तैराक होता है। आजादी से पहले रावली टाटगढ़,कुम्भलगढ़,फुलवारी, जयसमंद,चीरवाघाटी और सीतामाता अभ्यारण्य में बाघों की संख्या प्रचुर मात्रा में थी। इससे अर्थ यह निकलता है कि राजस्थान बाघों के लिए आज भी मुफीद जगह है यदि उसे अपना आहर मिलता रहे तो क्योंकि पेट की आग के लिए इंसान भी जानवर बन जाता है फिर बाघ तो असल में ही जानवर है।
बाक्स:
कुछ दिनों पहले एक खबर आई कि
सेंटल जू अथॉरिटी ने देश भर के चिडिय़ाघरों में बंद बाघों(टाइगर) के प्रजनन से रोक हटा ली है। राजस्थान में भी इसे लेकर खुशी का माहौल है कि प्रदेश के चिडिय़ाघरों में बंद बूढ़े शेरों से आखिर कुछ पाने की उम्मीद जगेगी। जानकारों का मानना है कि सजावटी शेर पाने की दिशा में यह अच्छा कदम है। राजस्थान में इस घोषणा के बाद उम्मीद बंधी है कि यहां फिर देश का राष्ट्रीय पशु अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त कर लेगा। जोधपुर से इसकी शुरुआत की जा रही है। जहां पर 8 साल के रुद्र और 11 साल की सीता (बाघिन) को मेल कराने के लिए वन विभाग प्रयास कर रहा है। वन विभाग के सूत्रों के अनुसार पिंजरे में बंद और चिडिय़ाघरों में पैदा हुए बाघों में जंगली आदतें नहीं होती अत: पहले रुद्र और सीता को माचिया के बायलोजिकल पार्क में रखा जाएगा । मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक आर. एन. महरोत्रा के अनुसार सेंट्रल जू अथॉरिटी ने चिडिय़ाघरों में बाघों को साथ रखने की पाबंदी भले ही हटा ली हो लेकिन इसके लिए चिडिय़ाघरों में पर्याप्त संसाधनों का होना जरुरी है। सूत्रों के अनुसार वन विभाग के अधिकारियों में इस सेंट्रल जू अथॉरिटी के आदेश के बाद से ही दो मत हो गए हैं।
देश भर में घट रहे बाघों के लिए इन दिनों टेलीविजन पर एक मुहिम छिड़ी हुई है। एक विज्ञापन के जरिए बताया जा रहा है कि देश में केवल 1411 बाघ बचे हैं और इन्हें बचाने के लिए एसएमएस कीजिए। क्यों किसी के मन मस्तिकष में यह सवाल नहीं उठता की, क्या केवल संदेश भेजने मात्र से ही बाघों को बचाया जा सकता है? यह अलग बात है कि इतने सालों से सिर्फ संदेश भेजते रहने के ही कारण आज हमारा राष्ट्रीय पशु बाघ यानि टाईगर इतनी दयनीय स्थिति में आ गया है कि उसे बचाने के लिए चारों ओर हाहाकार मचा है। बाघ को बचाने के लिए क्या किया जाए यह समझने के लिए जंगलों की खाक छाननी होती है और जानवरों और जंगल के आस-पास रहने वालों के व्यवहार का अध्ययन करना होता है। आज वन विभाग का कोई भी अधिकारी जंगलों के कितना नजदीक है यह इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाघों की संख्या घटती जाती है और किसी को कानों कान तक खबर नहीं होती। खैर, हकीकत यह है कि बाघ लुप्त हो रहा है देश से भी और राजस्थान से भी। राजस्थान बाघों के लिए रियासतकालीन समय में उत्तम स्थान था। पर्यावरणविदें की राय में बाघ के खत्म होने का अर्थ है संपूर्ण ईको सिस्टम का खत्म होना। अगर किसी जंगल में बाघ है तो मान लेना चाहिए कि उस क्षेत्र का पारिस्थितिक तंत्र बहुत ही अच्छा है। सीधा सा अर्थ है कि जंगल बचेगा तो बाघ बचेगा। जंगल और बाघ एक दूसरे के पूरक हैं लेकिन इन दिनों सभी को एक ही चिंता है कि सेव टाईगर यानि बाघ बचाओ। सीधी सी गणित है बाघ के लिए आदर्श पस्थितियां तैयार करो और बाघ के शावकों की अठखेलियां देखो लेकिन जंगल और पर्यावरण बचाने की दिशा में क्या काम हो रहा है वो केवल फाइलों में ही है। देश में केवल 1411 बाघ हैं और राजस्थान में मात्र 41। सवाईमाधोपुर के रणथम्भौर को बाघों के लिए पहचाना जाता है। सरिस्का भी कुछ दिनों पहले तक बाघ के लिए ही मशहूर था लेकिन एक एक करके सारे बाघों का शिकार हो गया या फिर वे कालकलवित हो गए। क्या किसी अफसर को इसके लिए दोषी ठहराया गया शायद नहीं। क्योंकि तब तक किसी को बाघ के मरने से फर्क नहीं पड़ता था। अब जब सारे मारे गए तो लोगों को चिंता सता रही है। जानकारों की राय में सरिस्का में जिन तीन बाघों को ले जा कर बसाया गया है एक शरणार्थी शिविर की भांति वह कितना सफल होता है यह शायद दस से बीस साल में पता चले। दुनिया में बाघ की आठ प्रजातियां पाई जाती थी। जिनमें से तीन तो समाप्त हो चुकी हैं और पांच बची हैं। कैस्पियन टाईगर,चाइनीज टाइगर,जर्मन टाईगर, साइबेरियन टाईगर, सुमात्रा टाईगर,साउथ चाइनीज टाईगर,जावा टाईगर और इंडियन टाईगर नामक प्रजातियां थी और जिनमें से कैस्पियन टाईगर,चाइनीज टाइगर,जर्मन टाईगर तो लुप्त ही हो चुके हैं।
जानकारों की राय में राजस्थान में बाघों का लुप्त होने का कारण जंगलों का घटना है। जब राजस्थान का गठन हुआ उस समय प्रदेश के जंगलों की अंधाधुंध कटाई हुई। 1972 में जब प्रोजेक्ट टाईगर अस्तित्व में आया तब तक वन विभाग के सामने खत्म हो रहे जंगलों को बचाना एक मात्र उद्देश्य था। उस समय जंगलों को बचाने के लिए वन विभाग द्वारा एक ही प्रजाति के वृक्षों को रोप कर जंगल बचाने की कवायद की गई। लगभग मैदानों में तब्दील होते जंगलों को बचाने के लिए अकेशिया टोरटलिस(इजरायली बबूल),जूलीफलोरा(विलायती बबूल),शीशम और सफेदा सहित कुछ अन्य प्रजातियों के वृक्षों को लगाया गया। इससे हरियाली तो मिली लेकिन चारा और घास खत्म हो गई। साफतौर पर जंगल का त्रि-स्तरीय ढांचा बिगड़ गया। जिसका सीधा असर सरीसर्प वर्ग, खरगोश, सियार, लोमड़ी और सांभर, चीतल और हिरणों आदी पर पड़ा। खाने की कमी के कारण इनकी वंशवृद्धि भी कम होती गई और बाघ को अपने स्वादिष्ट भोजन से महरूम होना पड़ा। बाघों के लुप्त होने के पीछे यह भी एक बहुत बड़ा कारण है कि एन्टीलोब्स(सांभर, चीतल और हिरण आदी) खत्म होगए।
इस बात की सत्यता इसी बात से सामने आ जाती है कि प्रदेश के वन मंत्री ने दिल्ली एक पत्र लिखकर दिल्ली के चिडिय़ाघर और आस पास अधिक हो चुके एन्टीलोब्स को राजस्थान भेजने की मांग की है जिससे की सरिस्का में बाघों के पुनर्वास में दिक्कत नहीं आए।
राजस्थान की खासियत है कि यहां आज तक आदमखोर बाघ नहीं हुआ और राजस्थान के जंगलों में जितना नजदीक से बाघ को देखा जा सकता है वह देश में ओर कहीं नहीं है। बाघ की वंशवृद्धि पूरे साल की जा सकती है अगर आदर्श परिस्थितियां होतो लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। सवाईमाधोपुर में केवल रणथम्भौर पर सभी का ध्यान है लेकिन मानसिंह सेंचुरी, रामगढ़ अभ्यारण्य और कैलादेवी के जंगलों पर किसी की नजर नहीं। इसी प्रकार अलवर से होते हुए बाघों के प्रिय स्थान डिगौता,जमवारामगढ़,नाहरगढ़ और मायला बाग की ओर कोई नहीं देख रहा। ऐसे ही हाड़ौती क्षेत्र में दर्रा और उससे लगते हुए वन्य क्षेत्र में सांभर, चीतल और हिरण क्यों नहीं बढ़ाए जा रहे । कॉरिडोर विकसित होते तो बाघ नहीं मरते क्योंकि भोजन के साथ साथ पानी की कमी झेल रहे बाघ अपने क्षेत्र से बाहर आते हैं शिकारियों या फिर किसानों और पशुपालकों द्वारा संगठित होकर मार दिए जाते हैं। ऐसे में कैसे बचे बाघ। सदाबाहर, आद्र्र,पतझड़ और तराई क्षेत्रों के वनों में पाया जाना वाला टाईगर एक अच्छा तैराक होता है। आजादी से पहले रावली टाटगढ़,कुम्भलगढ़,फुलवारी, जयसमंद,चीरवाघाटी और सीतामाता अभ्यारण्य में बाघों की संख्या प्रचुर मात्रा में थी। इससे अर्थ यह निकलता है कि राजस्थान बाघों के लिए आज भी मुफीद जगह है यदि उसे अपना आहर मिलता रहे तो क्योंकि पेट की आग के लिए इंसान भी जानवर बन जाता है फिर बाघ तो असल में ही जानवर है।
बाक्स:
कुछ दिनों पहले एक खबर आई कि
सेंटल जू अथॉरिटी ने देश भर के चिडिय़ाघरों में बंद बाघों(टाइगर) के प्रजनन से रोक हटा ली है। राजस्थान में भी इसे लेकर खुशी का माहौल है कि प्रदेश के चिडिय़ाघरों में बंद बूढ़े शेरों से आखिर कुछ पाने की उम्मीद जगेगी। जानकारों का मानना है कि सजावटी शेर पाने की दिशा में यह अच्छा कदम है। राजस्थान में इस घोषणा के बाद उम्मीद बंधी है कि यहां फिर देश का राष्ट्रीय पशु अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त कर लेगा। जोधपुर से इसकी शुरुआत की जा रही है। जहां पर 8 साल के रुद्र और 11 साल की सीता (बाघिन) को मेल कराने के लिए वन विभाग प्रयास कर रहा है। वन विभाग के सूत्रों के अनुसार पिंजरे में बंद और चिडिय़ाघरों में पैदा हुए बाघों में जंगली आदतें नहीं होती अत: पहले रुद्र और सीता को माचिया के बायलोजिकल पार्क में रखा जाएगा । मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक आर. एन. महरोत्रा के अनुसार सेंट्रल जू अथॉरिटी ने चिडिय़ाघरों में बाघों को साथ रखने की पाबंदी भले ही हटा ली हो लेकिन इसके लिए चिडिय़ाघरों में पर्याप्त संसाधनों का होना जरुरी है। सूत्रों के अनुसार वन विभाग के अधिकारियों में इस सेंट्रल जू अथॉरिटी के आदेश के बाद से ही दो मत हो गए हैं।
Thursday, February 11, 2010
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