मार्क जुकेरबर्ग, डस्टिन मोस्कोविट्ज,क्रिस ह्यूजस और एडयूराडो सेवरियन ने मिलकर फेसबुक की कल्पना की। यह चारों दोस्त एक साथ एक ही कमरे में रहते थे और मार्क जुकेरबर्ग की मूल सोच को आगे बढ़ाने में साथ देते रहे। मार्क ने फेसबुक का नाम अपने बचपन की यादों के जखीरे में से निकाला। मार्क जब प्रेप क्लास में पढ़ रहे थे तो उनके स्कूल में एक छोटी सी किताब दी जाती थी जिसमें स्कूल में पढ़ रहे सारे छात्र-छात्राओं की जानकारियां थीं। इसे आम बोलचाल में फेसबुक कहा जाता था और यहीं से आज के स्वरूप वाली फेस बुक की कल्पना की गई। चारों दोस्तों के जीवन में झांकने से पता चलता है कि शुरूआत में यह चारों दोस्त एक साथ फेसबुक के बारे में सोचा करते थे और उसके बाद जैसे-जैसे सफलता मिलती गई वैसे-वैसे यह चारों दोस्त एक दूसरे से अलग होते गए और चार दोस्त चार दिशाओं जैसे हो गए। फेसबुक इन चार दोस्तों का ऎसा काम है कि भले ही इनके रास्ते अलग हो गए हों, फेसबुक के नाम के साथ इन चार व्यक्तियों का नाम हमेशा जुड़ा रहेगा।
आधुुनिक युग में दुनियाभर के मुद्दों पर बेबाक राय रखने के लिए आम आदमी आगे आ रहा है। देश, दुनिया और स्वयं के अंदर उठ रहे सवालों को दूसरों के साथ बांटना और दूसरों को राय देना, उनकी सुनना और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सोच बनाना। यह सब आसान है। हम खुश हैं क्योंकि हमने दूसरों के गम और खुशियां बांटी हैं। यह सब हुआ है सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक से। फेसबुक पर कितने ही लोग हैं जो एक दूसरे के जीवन में ताक-झांक कर रहे हैं और अनजानों को अपना दोस्त बनाते हुए हर छोटी से छोटी बात को दूसरे के साथ बांटते हैं। संचार क्रांति के इस युग में फेसबुक ने वह कर दिखाया है जो अन्तरराष्ट्रीय स्तर के नेता और उनकी नीतियां नहीं कर सकीं। दुनिया में भाईचारे की भावना को फै लाने में अव्वल फेसबुक के जन्मदाताओं ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी फेसबुक एक दिन ऎसा स्वरूप लेगी। २००४ से लेकर आज २०१० में मात्र छह साल के काल में फेसबुक एक बड़ा नाम हो चुकी है।
इसकी कामयाबी इस और ओर संकेत करती है कि रचनात्मक माहौल और काम को करने की आजादी अगर आपको दी जाए तो कल्पनाओं को साकार होते और पंख लगते देर नहीं लगती। जीता-जागता उदाहरण फेसबुक के रूप में सभी के सामने हैं। दुनिया भर में फेसबुक के ४० करोड़ प्रयोगकर्ता हैं और इनमें से सत्तर प्रतिशत अमेरिका के बाहर के हैं। भारत के लिए भी सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक नई बात नहीं है। यहां के लोग भी इससे जुड़ना चाहते हैं और इसके जरिए वह संपर्क करना चाहते हैं, मशहूर और नामी गिरामी हस्तियों तक जिनके बारे में सिर्फ पढ़ने और सुनने को मिलता था, उन्हीं हस्तियों को भारत की जनता क्या अच्छा है और क्या बुरा समझाती है। फिल्मी सितारे भी जनता तक पहुंचने के लिए फेसबुक का सहारा ले रहे हैं। कई देशों में इस साइट पर प्रतिबंध भी लगे लेकिन सारी सरहदों को तोड़ते हुए फेसबुक ने वैश्विक स्तर पर क्रांति की है उसका मुकाबला नहीं है। कई सवाल भी उठते हैं कि फेसबुक को यौन अपराधियों से दूर रखने के लिए साइट क्या कर रही है। क्रिस हग्स कहते हैं कि फेसबुक सूचना पर प्रयोगकर्ता को पूरा नियंत्रण देती है। फेसबुक का उपयोग करते समय सावधान रहना चाहिए कि हम किस बारे में बात कर रहे हैं, जितना हम खुद को सिखाएंगे, उससे भी ज्यादा हमें अपने बच्चों को सिखाना होगा, इससे हमारा समाज मजबूत बनेगा।
मार्क जुकेरबर्ग
२६ साल की आयु में मार्क दुनिया के सबसे युवा अरबपतियों में से एक हैं। यहूदी परिवार में जन्मे मार्क का अब युवा होने पर कि सी भी धर्म में विश्वास नहीं है। स्कूल के दिनों से ही मार्क ने प्रोग्रामिंग करना शुरू कर दिया था। उनका लालन-पालन न्यूयॉर्क जैसे शहर में हुआ। संगीत के शौकीन मार्क ने अपने शुरूआती दिनों में ही अपने पिता के दोस्तों के लिए कुछ प्रोग्राम तैयार किए। हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के बाद मार्क के दिमाग में यूनिवर्सिटी कैम्पस के लोगों के लिए एक प्रोग्राम बनाने का विचार आया और फेसबुक की परिकल्पना बनाई गई। शुरूआत में यह केवल हॉवर्ड यूनिवर्सिटी कैम्पस के छात्र-छात्राओं के लिए थी। २००७ में फेसबुक एक सोशल नेटवर्किग साइट के रूप में सामने आई और आज की तारीख में पूरी दुनिया में करीब आठ लाख लोग फेसबुक के लिए प्रोग्रामिंग करने में लगे हुए हैं। द सोशल नेटवर्क के नाम से मार्क जुकेरबर्ग और उनके साथियों पर एक फिल्म भी बनी है जो कि २०१० के अंत कर प्रदर्शित होगी। इस फिल्म में जस्टिन टिम्बरलेक मुख्य भूमिका में हैं।
एडुआर्डो सेवरियन
ब्राजील में पैदा हुए सेवरियन नब्बे के दशक में मियामी आ गए थे, वे भी हावर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रतिभाशाली छात्र थे और पढ़ाई पूरी होते-होते वह फेसबुक अभियान में जुट गए थे। फेसबुक से एडुआर्डो सेवरियन अलग हो गए क्योंकि समय के साथ उनके और मुख्य संस्थापक मार्क जुकेरबर्ग के बीच गहरे वैचारिक मतभेद पैदा हो गए थे। धीरे-धीरे सेवरियन का प्रभाव भी फेसबुक में हर स्तर पर खत्म होता जा रहा था, आखिरकार सेवरियन ने कानूनी लड़ाई लड़ी और इसका नतीजा यह हुआ उन्हें फेसबुक में सह-संस्थापक का दर्जा दे दिया गया, जो फेसबुक के इतिहास में दर्ज रहेगा।
क्रिस हग्स
क्रिस हग्स का जन्म उत्तरी कोरोलिना में २६ नवंबर १९८३ को हुआ, क्रिस को भी फेसबुक का सह-संस्थापक माना जाता है। हावर्ड से इतिहास और साहित्य की पढाई करने वाले क्रिस फेसबुक के ऑनलाइन प्रवक्ता के रूप में कार्य करते थे। उन्हें फेसबुक से अलग पहचान उस समय मिली जब उन्होंने बराक हुसैन ओबामा के लिए ऑनलाइन प्रचार कार्यक्रम बनाया। कहा भी जाता है कि बराक कि जीत में इंटरनेट और क्रिस ह्यूजस का बड़ा योगदान है। क्रिस इस समय अमेरिका में बड़े उद्योगपतियों में शुमार किए जाते हैं। उनके बारे में खास बात यह भी है कि वे घोषित रूप से समलैंगिक हैं।
डस्टिन मोस्कोविट्ज
वाशिंगटन डीसी में पैदा हुए डस्टिन मोस्कोविट्ज ने हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ने के लिए दाखिला लिया और बाद में वह पाल आल्टो चले गए फेसबुक अभियान के लिए। डस्टिन ने फेसबुक में अच्छा खासा योगदान दिया और उसके बाद उन्होंने खुद की एक नई कंपनी शुरू कर दी। डस्टिन के फेसबुक से हटते ही कंपनी से काफी लोगों ने अलविदा कहना शुरू कर दिया, लेकिन जल्द ही फेसबुक के सीईओ मार्क जुकेरबर्ग को कहना पड़ा कि डस्टिन हमेशा फेसबुक के हमेशा से शुभचिंतक हैं और रहेंगे। मार्क ने यह भी कहा कि उन्हें जब भी सलाह लेनी होगी तो वह डस्टिन से ही सलाह लेंगे।
Sunday, May 30, 2010
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