मार्क जुकेरबर्ग, डस्टिन मोस्कोविट्ज,क्रिस ह्यूजस और एडयूराडो सेवरियन ने मिलकर फेसबुक की कल्पना की। यह चारों दोस्त एक साथ एक ही कमरे में रहते थे और मार्क जुकेरबर्ग की मूल सोच को आगे बढ़ाने में साथ देते रहे। मार्क ने फेसबुक का नाम अपने बचपन की यादों के जखीरे में से निकाला। मार्क जब प्रेप क्लास में पढ़ रहे थे तो उनके स्कूल में एक छोटी सी किताब दी जाती थी जिसमें स्कूल में पढ़ रहे सारे छात्र-छात्राओं की जानकारियां थीं। इसे आम बोलचाल में फेसबुक कहा जाता था और यहीं से आज के स्वरूप वाली फेस बुक की कल्पना की गई। चारों दोस्तों के जीवन में झांकने से पता चलता है कि शुरूआत में यह चारों दोस्त एक साथ फेसबुक के बारे में सोचा करते थे और उसके बाद जैसे-जैसे सफलता मिलती गई वैसे-वैसे यह चारों दोस्त एक दूसरे से अलग होते गए और चार दोस्त चार दिशाओं जैसे हो गए। फेसबुक इन चार दोस्तों का ऎसा काम है कि भले ही इनके रास्ते अलग हो गए हों, फेसबुक के नाम के साथ इन चार व्यक्तियों का नाम हमेशा जुड़ा रहेगा।
आधुुनिक युग में दुनियाभर के मुद्दों पर बेबाक राय रखने के लिए आम आदमी आगे आ रहा है। देश, दुनिया और स्वयं के अंदर उठ रहे सवालों को दूसरों के साथ बांटना और दूसरों को राय देना, उनकी सुनना और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सोच बनाना। यह सब आसान है। हम खुश हैं क्योंकि हमने दूसरों के गम और खुशियां बांटी हैं। यह सब हुआ है सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक से। फेसबुक पर कितने ही लोग हैं जो एक दूसरे के जीवन में ताक-झांक कर रहे हैं और अनजानों को अपना दोस्त बनाते हुए हर छोटी से छोटी बात को दूसरे के साथ बांटते हैं। संचार क्रांति के इस युग में फेसबुक ने वह कर दिखाया है जो अन्तरराष्ट्रीय स्तर के नेता और उनकी नीतियां नहीं कर सकीं। दुनिया में भाईचारे की भावना को फै लाने में अव्वल फेसबुक के जन्मदाताओं ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी फेसबुक एक दिन ऎसा स्वरूप लेगी। २००४ से लेकर आज २०१० में मात्र छह साल के काल में फेसबुक एक बड़ा नाम हो चुकी है।
इसकी कामयाबी इस और ओर संकेत करती है कि रचनात्मक माहौल और काम को करने की आजादी अगर आपको दी जाए तो कल्पनाओं को साकार होते और पंख लगते देर नहीं लगती। जीता-जागता उदाहरण फेसबुक के रूप में सभी के सामने हैं। दुनिया भर में फेसबुक के ४० करोड़ प्रयोगकर्ता हैं और इनमें से सत्तर प्रतिशत अमेरिका के बाहर के हैं। भारत के लिए भी सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक नई बात नहीं है। यहां के लोग भी इससे जुड़ना चाहते हैं और इसके जरिए वह संपर्क करना चाहते हैं, मशहूर और नामी गिरामी हस्तियों तक जिनके बारे में सिर्फ पढ़ने और सुनने को मिलता था, उन्हीं हस्तियों को भारत की जनता क्या अच्छा है और क्या बुरा समझाती है। फिल्मी सितारे भी जनता तक पहुंचने के लिए फेसबुक का सहारा ले रहे हैं। कई देशों में इस साइट पर प्रतिबंध भी लगे लेकिन सारी सरहदों को तोड़ते हुए फेसबुक ने वैश्विक स्तर पर क्रांति की है उसका मुकाबला नहीं है। कई सवाल भी उठते हैं कि फेसबुक को यौन अपराधियों से दूर रखने के लिए साइट क्या कर रही है। क्रिस हग्स कहते हैं कि फेसबुक सूचना पर प्रयोगकर्ता को पूरा नियंत्रण देती है। फेसबुक का उपयोग करते समय सावधान रहना चाहिए कि हम किस बारे में बात कर रहे हैं, जितना हम खुद को सिखाएंगे, उससे भी ज्यादा हमें अपने बच्चों को सिखाना होगा, इससे हमारा समाज मजबूत बनेगा।
मार्क जुकेरबर्ग
२६ साल की आयु में मार्क दुनिया के सबसे युवा अरबपतियों में से एक हैं। यहूदी परिवार में जन्मे मार्क का अब युवा होने पर कि सी भी धर्म में विश्वास नहीं है। स्कूल के दिनों से ही मार्क ने प्रोग्रामिंग करना शुरू कर दिया था। उनका लालन-पालन न्यूयॉर्क जैसे शहर में हुआ। संगीत के शौकीन मार्क ने अपने शुरूआती दिनों में ही अपने पिता के दोस्तों के लिए कुछ प्रोग्राम तैयार किए। हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के बाद मार्क के दिमाग में यूनिवर्सिटी कैम्पस के लोगों के लिए एक प्रोग्राम बनाने का विचार आया और फेसबुक की परिकल्पना बनाई गई। शुरूआत में यह केवल हॉवर्ड यूनिवर्सिटी कैम्पस के छात्र-छात्राओं के लिए थी। २००७ में फेसबुक एक सोशल नेटवर्किग साइट के रूप में सामने आई और आज की तारीख में पूरी दुनिया में करीब आठ लाख लोग फेसबुक के लिए प्रोग्रामिंग करने में लगे हुए हैं। द सोशल नेटवर्क के नाम से मार्क जुकेरबर्ग और उनके साथियों पर एक फिल्म भी बनी है जो कि २०१० के अंत कर प्रदर्शित होगी। इस फिल्म में जस्टिन टिम्बरलेक मुख्य भूमिका में हैं।
एडुआर्डो सेवरियन
ब्राजील में पैदा हुए सेवरियन नब्बे के दशक में मियामी आ गए थे, वे भी हावर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रतिभाशाली छात्र थे और पढ़ाई पूरी होते-होते वह फेसबुक अभियान में जुट गए थे। फेसबुक से एडुआर्डो सेवरियन अलग हो गए क्योंकि समय के साथ उनके और मुख्य संस्थापक मार्क जुकेरबर्ग के बीच गहरे वैचारिक मतभेद पैदा हो गए थे। धीरे-धीरे सेवरियन का प्रभाव भी फेसबुक में हर स्तर पर खत्म होता जा रहा था, आखिरकार सेवरियन ने कानूनी लड़ाई लड़ी और इसका नतीजा यह हुआ उन्हें फेसबुक में सह-संस्थापक का दर्जा दे दिया गया, जो फेसबुक के इतिहास में दर्ज रहेगा।
क्रिस हग्स
क्रिस हग्स का जन्म उत्तरी कोरोलिना में २६ नवंबर १९८३ को हुआ, क्रिस को भी फेसबुक का सह-संस्थापक माना जाता है। हावर्ड से इतिहास और साहित्य की पढाई करने वाले क्रिस फेसबुक के ऑनलाइन प्रवक्ता के रूप में कार्य करते थे। उन्हें फेसबुक से अलग पहचान उस समय मिली जब उन्होंने बराक हुसैन ओबामा के लिए ऑनलाइन प्रचार कार्यक्रम बनाया। कहा भी जाता है कि बराक कि जीत में इंटरनेट और क्रिस ह्यूजस का बड़ा योगदान है। क्रिस इस समय अमेरिका में बड़े उद्योगपतियों में शुमार किए जाते हैं। उनके बारे में खास बात यह भी है कि वे घोषित रूप से समलैंगिक हैं।
डस्टिन मोस्कोविट्ज
वाशिंगटन डीसी में पैदा हुए डस्टिन मोस्कोविट्ज ने हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ने के लिए दाखिला लिया और बाद में वह पाल आल्टो चले गए फेसबुक अभियान के लिए। डस्टिन ने फेसबुक में अच्छा खासा योगदान दिया और उसके बाद उन्होंने खुद की एक नई कंपनी शुरू कर दी। डस्टिन के फेसबुक से हटते ही कंपनी से काफी लोगों ने अलविदा कहना शुरू कर दिया, लेकिन जल्द ही फेसबुक के सीईओ मार्क जुकेरबर्ग को कहना पड़ा कि डस्टिन हमेशा फेसबुक के हमेशा से शुभचिंतक हैं और रहेंगे। मार्क ने यह भी कहा कि उन्हें जब भी सलाह लेनी होगी तो वह डस्टिन से ही सलाह लेंगे।
Sunday, May 30, 2010
Friday, May 28, 2010
hollywood
हॉलीवुड बचा बॉलीवुड की स्टाइल में
हॉलीवुड नष्ट होने से बच गया। हॉलीवुड भेंट चढऩे वाला था कुछ भू-व्यवसायियों के हत्थे।
जागरुक लोगों ने हॉलीवुड को आखिर बचा लिया। मशहूर अंग्रेजी मैगजीन प्लेब्वॉय के मालिक ह्यू हेफऩर ने दरियादिली दिखाई और एक ऐसी दुनिया के प्रतीक को नष्ट होने से बचा लिया जिसका अनुसरण सारी दुनिया करना चाहती है और उसका हिस्सा बनना चाहती है।
हॉलीवुड अमेरिका की फिल्मी दुनिया। हॉलीवुड के बारे में कहा जाए तो सिर्फ इतना की नाम ही काफी है। ऐसे में हॉलीवुड को पहचान देने वाले हॉलीवुड प्रतीक चिन्ह को नष्ट कर देना दुनिया के लाखों लोगों के सपनों की हत्या कर देने के बराबर था। जिसका अंदेशा अमरिका के भू-व्यवसायियों को भी था। ऐसे में सामने आए कुछ ऐसे लोग जिन्हें हॉलीवुड की हस्ती कहा जाता है और एक विश्व प्रसिद्ध धरोधर एक प्रतीक चिन्ह को बचा लिया गया।
एक प्रतीक चिन्ह के लिए ऐसी चिंता बड़ी बात है और यह भी दर्शाती है कि आपका विश्वास अपनी धरोहर को सहेजने में कितना है। हॉरर, सस्पेंस,रोमांस और रोमांच जो कि हॉलीवुड सिनेमा का अनिवार्य अंग होते हैं वैसा ही लॉस एंजिल्स की माउंट ली की पहाड़ी पर स्थित हॉलीवुड के प्रतीक चिन्ह को बचाने के लिए की गई कवायद में देखने को मिला। कहानी सारी फिल्मी है कि तर्ज पर हॉलीवुड के प्रतीक चिन्ह को बचाया गया बॉलीवुड की मसाला और हैप्पी एंड वाली फिल्मों की स्टाइल में। कहते हैं ना फिल्मी दुनिया की चमक दमक और लीपे पुते चेहरों के पीछे कितनी उदासी छिपी होती है हर कोई नहीं समझ सकता। ऐसा ही कुछ हुआ हॉलीवुड की दुनिया में। सारी दुनिया में मुहिम छिड़ी रही कि कैसे बचाए हॉलीवुड को फिर बगल में छोरा और शहर में ढिढ़ोरा की कहावत को चरितार्थ करते हुए एक शख्स बाहर निकले और उन्होंने हॉलीवुड ट्रस्ट को दान दिया जिससे बच गया हॉलीवुड। एक आम भारतीय फिल्म की स्टोरी लेकिन भावनाओं से ओत-प्रोत इसी भावना के कारण बचा हॉलीवुड का प्रतीक चिन्ह। कहानी कुछ इस तरह है कि लॉस एंजिल्स की पहाडिय़ों पर 1923 में माउंट ली की पहाड़ी पर एक रियल स्टेट डेवलपर कंपनी ने इस श्रेत्र में आवासीय मकान बनाने के लिए एक विज्ञापन तैयार किया हॉलीवुड लैंड के नाम से । यह साइन बोर्ड लगाया गया और फिर अमेरिकी सिनेमा की प्रगति के साथ ही इसे हॉलीवुड कर दिया गया। दरअसल, हॉलीवुड के इस प्रतीक पर शहर का अधिकार है लेकिन इसके आस-पास की संपत्ति पर शिकागो की एक निवेश कंपनी का अधिकार है। शिकागो की इस निवेश कंपनी को प्रतीक चिन्ह के आस-पास की 138 एकड़ जमीन पर आवास बनाने थे लेकिन वह इस बात पर भी राजी थे कि अगर हॉलीवुड प्रतीक चिन्ह की देखरेख करने वाला ट्रस्ट इस कंपनी को एक करोड़ पच्चीस लाख डॉलर दे दे तो वह इस जमीन को ट्रस्ट के नाम कर देंगे। यहीं से शुरु हुआ पैसा एकत्र करने की कवायद । अमेरिका के 50 राज्य और दुनिया के करीब दस देश इस मुहिम में लग गए कि कैसे भी करके एक करोड़ पच्चीस लाख डॉलर शिकागो की कंपनी को देने हैं। 45 फीट उंचे और 350 फुट की लंबाई वाले हॉलीवुड प्रतीक चिन्ह को ढक दिया गया और उस पर लिखा गया, सेव द पीक, सेव द साइन ऑव हॉलीवुड। 1978 में इस प्रतीक चिन्ह की दुबारा मरम्मत की गई थी और इसे पूरा स्टील से बनाया गया जिसके वास्तुकार थे रिचर्ड हिर गॉफ। दुनिया में फैली इस चिंता में दुनिया के बड़े फिल्मकार,कलाकार और उद्योगपति जुट गए। इसके लिए टॉम हैंक्स और निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग जैसी हस्तियों ने भी दान दिया फिर भी नौ लॉख डॉलर कम पड़े तो मशहूर पत्रिका प्लेब्वॉय के मालिक ह्यू हे$फनर ने दान दिया और हॉलीवुड का प्रतीक चिन्ह नष्ट होने से बच गया। ह्यू हेफऩर ने 1978 में भी इस प्रतीक चिन्ह की मरम्मत के लिए दान दिया और एक बार फिर वे हॉलीवुड के लिए तारणहार बन कर आए। ह्यू हेफऩर ने कहा कि उनके लिए हॉलीवुड का प्रतीक चिन्ह एफिल टावर के समान है और उनके सारे सपने और कल्पनाएं हॉलीवुड के कारण आई। जिसका स्पष्य प्रभाव उनकी पत्रिका प्लेब्वॉय में देखने को मिलता है। : नभय:
हॉलीवुड नष्ट होने से बच गया। हॉलीवुड भेंट चढऩे वाला था कुछ भू-व्यवसायियों के हत्थे।
जागरुक लोगों ने हॉलीवुड को आखिर बचा लिया। मशहूर अंग्रेजी मैगजीन प्लेब्वॉय के मालिक ह्यू हेफऩर ने दरियादिली दिखाई और एक ऐसी दुनिया के प्रतीक को नष्ट होने से बचा लिया जिसका अनुसरण सारी दुनिया करना चाहती है और उसका हिस्सा बनना चाहती है।
हॉलीवुड अमेरिका की फिल्मी दुनिया। हॉलीवुड के बारे में कहा जाए तो सिर्फ इतना की नाम ही काफी है। ऐसे में हॉलीवुड को पहचान देने वाले हॉलीवुड प्रतीक चिन्ह को नष्ट कर देना दुनिया के लाखों लोगों के सपनों की हत्या कर देने के बराबर था। जिसका अंदेशा अमरिका के भू-व्यवसायियों को भी था। ऐसे में सामने आए कुछ ऐसे लोग जिन्हें हॉलीवुड की हस्ती कहा जाता है और एक विश्व प्रसिद्ध धरोधर एक प्रतीक चिन्ह को बचा लिया गया।
एक प्रतीक चिन्ह के लिए ऐसी चिंता बड़ी बात है और यह भी दर्शाती है कि आपका विश्वास अपनी धरोहर को सहेजने में कितना है। हॉरर, सस्पेंस,रोमांस और रोमांच जो कि हॉलीवुड सिनेमा का अनिवार्य अंग होते हैं वैसा ही लॉस एंजिल्स की माउंट ली की पहाड़ी पर स्थित हॉलीवुड के प्रतीक चिन्ह को बचाने के लिए की गई कवायद में देखने को मिला। कहानी सारी फिल्मी है कि तर्ज पर हॉलीवुड के प्रतीक चिन्ह को बचाया गया बॉलीवुड की मसाला और हैप्पी एंड वाली फिल्मों की स्टाइल में। कहते हैं ना फिल्मी दुनिया की चमक दमक और लीपे पुते चेहरों के पीछे कितनी उदासी छिपी होती है हर कोई नहीं समझ सकता। ऐसा ही कुछ हुआ हॉलीवुड की दुनिया में। सारी दुनिया में मुहिम छिड़ी रही कि कैसे बचाए हॉलीवुड को फिर बगल में छोरा और शहर में ढिढ़ोरा की कहावत को चरितार्थ करते हुए एक शख्स बाहर निकले और उन्होंने हॉलीवुड ट्रस्ट को दान दिया जिससे बच गया हॉलीवुड। एक आम भारतीय फिल्म की स्टोरी लेकिन भावनाओं से ओत-प्रोत इसी भावना के कारण बचा हॉलीवुड का प्रतीक चिन्ह। कहानी कुछ इस तरह है कि लॉस एंजिल्स की पहाडिय़ों पर 1923 में माउंट ली की पहाड़ी पर एक रियल स्टेट डेवलपर कंपनी ने इस श्रेत्र में आवासीय मकान बनाने के लिए एक विज्ञापन तैयार किया हॉलीवुड लैंड के नाम से । यह साइन बोर्ड लगाया गया और फिर अमेरिकी सिनेमा की प्रगति के साथ ही इसे हॉलीवुड कर दिया गया। दरअसल, हॉलीवुड के इस प्रतीक पर शहर का अधिकार है लेकिन इसके आस-पास की संपत्ति पर शिकागो की एक निवेश कंपनी का अधिकार है। शिकागो की इस निवेश कंपनी को प्रतीक चिन्ह के आस-पास की 138 एकड़ जमीन पर आवास बनाने थे लेकिन वह इस बात पर भी राजी थे कि अगर हॉलीवुड प्रतीक चिन्ह की देखरेख करने वाला ट्रस्ट इस कंपनी को एक करोड़ पच्चीस लाख डॉलर दे दे तो वह इस जमीन को ट्रस्ट के नाम कर देंगे। यहीं से शुरु हुआ पैसा एकत्र करने की कवायद । अमेरिका के 50 राज्य और दुनिया के करीब दस देश इस मुहिम में लग गए कि कैसे भी करके एक करोड़ पच्चीस लाख डॉलर शिकागो की कंपनी को देने हैं। 45 फीट उंचे और 350 फुट की लंबाई वाले हॉलीवुड प्रतीक चिन्ह को ढक दिया गया और उस पर लिखा गया, सेव द पीक, सेव द साइन ऑव हॉलीवुड। 1978 में इस प्रतीक चिन्ह की दुबारा मरम्मत की गई थी और इसे पूरा स्टील से बनाया गया जिसके वास्तुकार थे रिचर्ड हिर गॉफ। दुनिया में फैली इस चिंता में दुनिया के बड़े फिल्मकार,कलाकार और उद्योगपति जुट गए। इसके लिए टॉम हैंक्स और निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग जैसी हस्तियों ने भी दान दिया फिर भी नौ लॉख डॉलर कम पड़े तो मशहूर पत्रिका प्लेब्वॉय के मालिक ह्यू हे$फनर ने दान दिया और हॉलीवुड का प्रतीक चिन्ह नष्ट होने से बच गया। ह्यू हेफऩर ने 1978 में भी इस प्रतीक चिन्ह की मरम्मत के लिए दान दिया और एक बार फिर वे हॉलीवुड के लिए तारणहार बन कर आए। ह्यू हेफऩर ने कहा कि उनके लिए हॉलीवुड का प्रतीक चिन्ह एफिल टावर के समान है और उनके सारे सपने और कल्पनाएं हॉलीवुड के कारण आई। जिसका स्पष्य प्रभाव उनकी पत्रिका प्लेब्वॉय में देखने को मिलता है। : नभय:
Thursday, May 27, 2010
save tiger
पेट की आग के लिए इंसान भी जानवर बन जाता है फिर बाघ तो असल में ही जानवर है
देश भर में घट रहे बाघों के लिए इन दिनों टेलीविजन पर एक मुहिम छिड़ी हुई है। एक विज्ञापन के जरिए बताया जा रहा है कि देश में केवल 1411 बाघ बचे हैं और इन्हें बचाने के लिए एसएमएस कीजिए। क्यों किसी के मन मस्तिकष में यह सवाल नहीं उठता की, क्या केवल संदेश भेजने मात्र से ही बाघों को बचाया जा सकता है? यह अलग बात है कि इतने सालों से सिर्फ संदेश भेजते रहने के ही कारण आज हमारा राष्ट्रीय पशु बाघ यानि टाईगर इतनी दयनीय स्थिति में आ गया है कि उसे बचाने के लिए चारों ओर हाहाकार मचा है। बाघ को बचाने के लिए क्या किया जाए यह समझने के लिए जंगलों की खाक छाननी होती है और जानवरों और जंगल के आस-पास रहने वालों के व्यवहार का अध्ययन करना होता है। आज वन विभाग का कोई भी अधिकारी जंगलों के कितना नजदीक है यह इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाघों की संख्या घटती जाती है और किसी को कानों कान तक खबर नहीं होती। खैर, हकीकत यह है कि बाघ लुप्त हो रहा है देश से भी और राजस्थान से भी। राजस्थान बाघों के लिए रियासतकालीन समय में उत्तम स्थान था। पर्यावरणविदें की राय में बाघ के खत्म होने का अर्थ है संपूर्ण ईको सिस्टम का खत्म होना। अगर किसी जंगल में बाघ है तो मान लेना चाहिए कि उस क्षेत्र का पारिस्थितिक तंत्र बहुत ही अच्छा है। सीधा सा अर्थ है कि जंगल बचेगा तो बाघ बचेगा। जंगल और बाघ एक दूसरे के पूरक हैं लेकिन इन दिनों सभी को एक ही चिंता है कि सेव टाईगर यानि बाघ बचाओ। सीधी सी गणित है बाघ के लिए आदर्श पस्थितियां तैयार करो और बाघ के शावकों की अठखेलियां देखो लेकिन जंगल और पर्यावरण बचाने की दिशा में क्या काम हो रहा है वो केवल फाइलों में ही है। देश में केवल 1411 बाघ हैं और राजस्थान में मात्र 41। सवाईमाधोपुर के रणथम्भौर को बाघों के लिए पहचाना जाता है। सरिस्का भी कुछ दिनों पहले तक बाघ के लिए ही मशहूर था लेकिन एक एक करके सारे बाघों का शिकार हो गया या फिर वे कालकलवित हो गए। क्या किसी अफसर को इसके लिए दोषी ठहराया गया शायद नहीं। क्योंकि तब तक किसी को बाघ के मरने से फर्क नहीं पड़ता था। अब जब सारे मारे गए तो लोगों को चिंता सता रही है। जानकारों की राय में सरिस्का में जिन तीन बाघों को ले जा कर बसाया गया है एक शरणार्थी शिविर की भांति वह कितना सफल होता है यह शायद दस से बीस साल में पता चले। दुनिया में बाघ की आठ प्रजातियां पाई जाती थी। जिनमें से तीन तो समाप्त हो चुकी हैं और पांच बची हैं। कैस्पियन टाईगर,चाइनीज टाइगर,जर्मन टाईगर, साइबेरियन टाईगर, सुमात्रा टाईगर,साउथ चाइनीज टाईगर,जावा टाईगर और इंडियन टाईगर नामक प्रजातियां थी और जिनमें से कैस्पियन टाईगर,चाइनीज टाइगर,जर्मन टाईगर तो लुप्त ही हो चुके हैं।
जानकारों की राय में राजस्थान में बाघों का लुप्त होने का कारण जंगलों का घटना है। जब राजस्थान का गठन हुआ उस समय प्रदेश के जंगलों की अंधाधुंध कटाई हुई। 1972 में जब प्रोजेक्ट टाईगर अस्तित्व में आया तब तक वन विभाग के सामने खत्म हो रहे जंगलों को बचाना एक मात्र उद्देश्य था। उस समय जंगलों को बचाने के लिए वन विभाग द्वारा एक ही प्रजाति के वृक्षों को रोप कर जंगल बचाने की कवायद की गई। लगभग मैदानों में तब्दील होते जंगलों को बचाने के लिए अकेशिया टोरटलिस(इजरायली बबूल),जूलीफलोरा(विलायती बबूल),शीशम और सफेदा सहित कुछ अन्य प्रजातियों के वृक्षों को लगाया गया। इससे हरियाली तो मिली लेकिन चारा और घास खत्म हो गई। साफतौर पर जंगल का त्रि-स्तरीय ढांचा बिगड़ गया। जिसका सीधा असर सरीसर्प वर्ग, खरगोश, सियार, लोमड़ी और सांभर, चीतल और हिरणों आदी पर पड़ा। खाने की कमी के कारण इनकी वंशवृद्धि भी कम होती गई और बाघ को अपने स्वादिष्ट भोजन से महरूम होना पड़ा। बाघों के लुप्त होने के पीछे यह भी एक बहुत बड़ा कारण है कि एन्टीलोब्स(सांभर, चीतल और हिरण आदी) खत्म होगए।
इस बात की सत्यता इसी बात से सामने आ जाती है कि प्रदेश के वन मंत्री ने दिल्ली एक पत्र लिखकर दिल्ली के चिडिय़ाघर और आस पास अधिक हो चुके एन्टीलोब्स को राजस्थान भेजने की मांग की है जिससे की सरिस्का में बाघों के पुनर्वास में दिक्कत नहीं आए।
राजस्थान की खासियत है कि यहां आज तक आदमखोर बाघ नहीं हुआ और राजस्थान के जंगलों में जितना नजदीक से बाघ को देखा जा सकता है वह देश में ओर कहीं नहीं है। बाघ की वंशवृद्धि पूरे साल की जा सकती है अगर आदर्श परिस्थितियां होतो लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। सवाईमाधोपुर में केवल रणथम्भौर पर सभी का ध्यान है लेकिन मानसिंह सेंचुरी, रामगढ़ अभ्यारण्य और कैलादेवी के जंगलों पर किसी की नजर नहीं। इसी प्रकार अलवर से होते हुए बाघों के प्रिय स्थान डिगौता,जमवारामगढ़,नाहरगढ़ और मायला बाग की ओर कोई नहीं देख रहा। ऐसे ही हाड़ौती क्षेत्र में दर्रा और उससे लगते हुए वन्य क्षेत्र में सांभर, चीतल और हिरण क्यों नहीं बढ़ाए जा रहे । कॉरिडोर विकसित होते तो बाघ नहीं मरते क्योंकि भोजन के साथ साथ पानी की कमी झेल रहे बाघ अपने क्षेत्र से बाहर आते हैं शिकारियों या फिर किसानों और पशुपालकों द्वारा संगठित होकर मार दिए जाते हैं। ऐसे में कैसे बचे बाघ। सदाबाहर, आद्र्र,पतझड़ और तराई क्षेत्रों के वनों में पाया जाना वाला टाईगर एक अच्छा तैराक होता है। आजादी से पहले रावली टाटगढ़,कुम्भलगढ़,फुलवारी, जयसमंद,चीरवाघाटी और सीतामाता अभ्यारण्य में बाघों की संख्या प्रचुर मात्रा में थी। इससे अर्थ यह निकलता है कि राजस्थान बाघों के लिए आज भी मुफीद जगह है यदि उसे अपना आहर मिलता रहे तो क्योंकि पेट की आग के लिए इंसान भी जानवर बन जाता है फिर बाघ तो असल में ही जानवर है।
बाक्स:
कुछ दिनों पहले एक खबर आई कि
सेंटल जू अथॉरिटी ने देश भर के चिडिय़ाघरों में बंद बाघों(टाइगर) के प्रजनन से रोक हटा ली है। राजस्थान में भी इसे लेकर खुशी का माहौल है कि प्रदेश के चिडिय़ाघरों में बंद बूढ़े शेरों से आखिर कुछ पाने की उम्मीद जगेगी। जानकारों का मानना है कि सजावटी शेर पाने की दिशा में यह अच्छा कदम है। राजस्थान में इस घोषणा के बाद उम्मीद बंधी है कि यहां फिर देश का राष्ट्रीय पशु अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त कर लेगा। जोधपुर से इसकी शुरुआत की जा रही है। जहां पर 8 साल के रुद्र और 11 साल की सीता (बाघिन) को मेल कराने के लिए वन विभाग प्रयास कर रहा है। वन विभाग के सूत्रों के अनुसार पिंजरे में बंद और चिडिय़ाघरों में पैदा हुए बाघों में जंगली आदतें नहीं होती अत: पहले रुद्र और सीता को माचिया के बायलोजिकल पार्क में रखा जाएगा । मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक आर. एन. महरोत्रा के अनुसार सेंट्रल जू अथॉरिटी ने चिडिय़ाघरों में बाघों को साथ रखने की पाबंदी भले ही हटा ली हो लेकिन इसके लिए चिडिय़ाघरों में पर्याप्त संसाधनों का होना जरुरी है। सूत्रों के अनुसार वन विभाग के अधिकारियों में इस सेंट्रल जू अथॉरिटी के आदेश के बाद से ही दो मत हो गए हैं।
देश भर में घट रहे बाघों के लिए इन दिनों टेलीविजन पर एक मुहिम छिड़ी हुई है। एक विज्ञापन के जरिए बताया जा रहा है कि देश में केवल 1411 बाघ बचे हैं और इन्हें बचाने के लिए एसएमएस कीजिए। क्यों किसी के मन मस्तिकष में यह सवाल नहीं उठता की, क्या केवल संदेश भेजने मात्र से ही बाघों को बचाया जा सकता है? यह अलग बात है कि इतने सालों से सिर्फ संदेश भेजते रहने के ही कारण आज हमारा राष्ट्रीय पशु बाघ यानि टाईगर इतनी दयनीय स्थिति में आ गया है कि उसे बचाने के लिए चारों ओर हाहाकार मचा है। बाघ को बचाने के लिए क्या किया जाए यह समझने के लिए जंगलों की खाक छाननी होती है और जानवरों और जंगल के आस-पास रहने वालों के व्यवहार का अध्ययन करना होता है। आज वन विभाग का कोई भी अधिकारी जंगलों के कितना नजदीक है यह इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाघों की संख्या घटती जाती है और किसी को कानों कान तक खबर नहीं होती। खैर, हकीकत यह है कि बाघ लुप्त हो रहा है देश से भी और राजस्थान से भी। राजस्थान बाघों के लिए रियासतकालीन समय में उत्तम स्थान था। पर्यावरणविदें की राय में बाघ के खत्म होने का अर्थ है संपूर्ण ईको सिस्टम का खत्म होना। अगर किसी जंगल में बाघ है तो मान लेना चाहिए कि उस क्षेत्र का पारिस्थितिक तंत्र बहुत ही अच्छा है। सीधा सा अर्थ है कि जंगल बचेगा तो बाघ बचेगा। जंगल और बाघ एक दूसरे के पूरक हैं लेकिन इन दिनों सभी को एक ही चिंता है कि सेव टाईगर यानि बाघ बचाओ। सीधी सी गणित है बाघ के लिए आदर्श पस्थितियां तैयार करो और बाघ के शावकों की अठखेलियां देखो लेकिन जंगल और पर्यावरण बचाने की दिशा में क्या काम हो रहा है वो केवल फाइलों में ही है। देश में केवल 1411 बाघ हैं और राजस्थान में मात्र 41। सवाईमाधोपुर के रणथम्भौर को बाघों के लिए पहचाना जाता है। सरिस्का भी कुछ दिनों पहले तक बाघ के लिए ही मशहूर था लेकिन एक एक करके सारे बाघों का शिकार हो गया या फिर वे कालकलवित हो गए। क्या किसी अफसर को इसके लिए दोषी ठहराया गया शायद नहीं। क्योंकि तब तक किसी को बाघ के मरने से फर्क नहीं पड़ता था। अब जब सारे मारे गए तो लोगों को चिंता सता रही है। जानकारों की राय में सरिस्का में जिन तीन बाघों को ले जा कर बसाया गया है एक शरणार्थी शिविर की भांति वह कितना सफल होता है यह शायद दस से बीस साल में पता चले। दुनिया में बाघ की आठ प्रजातियां पाई जाती थी। जिनमें से तीन तो समाप्त हो चुकी हैं और पांच बची हैं। कैस्पियन टाईगर,चाइनीज टाइगर,जर्मन टाईगर, साइबेरियन टाईगर, सुमात्रा टाईगर,साउथ चाइनीज टाईगर,जावा टाईगर और इंडियन टाईगर नामक प्रजातियां थी और जिनमें से कैस्पियन टाईगर,चाइनीज टाइगर,जर्मन टाईगर तो लुप्त ही हो चुके हैं।
जानकारों की राय में राजस्थान में बाघों का लुप्त होने का कारण जंगलों का घटना है। जब राजस्थान का गठन हुआ उस समय प्रदेश के जंगलों की अंधाधुंध कटाई हुई। 1972 में जब प्रोजेक्ट टाईगर अस्तित्व में आया तब तक वन विभाग के सामने खत्म हो रहे जंगलों को बचाना एक मात्र उद्देश्य था। उस समय जंगलों को बचाने के लिए वन विभाग द्वारा एक ही प्रजाति के वृक्षों को रोप कर जंगल बचाने की कवायद की गई। लगभग मैदानों में तब्दील होते जंगलों को बचाने के लिए अकेशिया टोरटलिस(इजरायली बबूल),जूलीफलोरा(विलायती बबूल),शीशम और सफेदा सहित कुछ अन्य प्रजातियों के वृक्षों को लगाया गया। इससे हरियाली तो मिली लेकिन चारा और घास खत्म हो गई। साफतौर पर जंगल का त्रि-स्तरीय ढांचा बिगड़ गया। जिसका सीधा असर सरीसर्प वर्ग, खरगोश, सियार, लोमड़ी और सांभर, चीतल और हिरणों आदी पर पड़ा। खाने की कमी के कारण इनकी वंशवृद्धि भी कम होती गई और बाघ को अपने स्वादिष्ट भोजन से महरूम होना पड़ा। बाघों के लुप्त होने के पीछे यह भी एक बहुत बड़ा कारण है कि एन्टीलोब्स(सांभर, चीतल और हिरण आदी) खत्म होगए।
इस बात की सत्यता इसी बात से सामने आ जाती है कि प्रदेश के वन मंत्री ने दिल्ली एक पत्र लिखकर दिल्ली के चिडिय़ाघर और आस पास अधिक हो चुके एन्टीलोब्स को राजस्थान भेजने की मांग की है जिससे की सरिस्का में बाघों के पुनर्वास में दिक्कत नहीं आए।
राजस्थान की खासियत है कि यहां आज तक आदमखोर बाघ नहीं हुआ और राजस्थान के जंगलों में जितना नजदीक से बाघ को देखा जा सकता है वह देश में ओर कहीं नहीं है। बाघ की वंशवृद्धि पूरे साल की जा सकती है अगर आदर्श परिस्थितियां होतो लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। सवाईमाधोपुर में केवल रणथम्भौर पर सभी का ध्यान है लेकिन मानसिंह सेंचुरी, रामगढ़ अभ्यारण्य और कैलादेवी के जंगलों पर किसी की नजर नहीं। इसी प्रकार अलवर से होते हुए बाघों के प्रिय स्थान डिगौता,जमवारामगढ़,नाहरगढ़ और मायला बाग की ओर कोई नहीं देख रहा। ऐसे ही हाड़ौती क्षेत्र में दर्रा और उससे लगते हुए वन्य क्षेत्र में सांभर, चीतल और हिरण क्यों नहीं बढ़ाए जा रहे । कॉरिडोर विकसित होते तो बाघ नहीं मरते क्योंकि भोजन के साथ साथ पानी की कमी झेल रहे बाघ अपने क्षेत्र से बाहर आते हैं शिकारियों या फिर किसानों और पशुपालकों द्वारा संगठित होकर मार दिए जाते हैं। ऐसे में कैसे बचे बाघ। सदाबाहर, आद्र्र,पतझड़ और तराई क्षेत्रों के वनों में पाया जाना वाला टाईगर एक अच्छा तैराक होता है। आजादी से पहले रावली टाटगढ़,कुम्भलगढ़,फुलवारी, जयसमंद,चीरवाघाटी और सीतामाता अभ्यारण्य में बाघों की संख्या प्रचुर मात्रा में थी। इससे अर्थ यह निकलता है कि राजस्थान बाघों के लिए आज भी मुफीद जगह है यदि उसे अपना आहर मिलता रहे तो क्योंकि पेट की आग के लिए इंसान भी जानवर बन जाता है फिर बाघ तो असल में ही जानवर है।
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कुछ दिनों पहले एक खबर आई कि
सेंटल जू अथॉरिटी ने देश भर के चिडिय़ाघरों में बंद बाघों(टाइगर) के प्रजनन से रोक हटा ली है। राजस्थान में भी इसे लेकर खुशी का माहौल है कि प्रदेश के चिडिय़ाघरों में बंद बूढ़े शेरों से आखिर कुछ पाने की उम्मीद जगेगी। जानकारों का मानना है कि सजावटी शेर पाने की दिशा में यह अच्छा कदम है। राजस्थान में इस घोषणा के बाद उम्मीद बंधी है कि यहां फिर देश का राष्ट्रीय पशु अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त कर लेगा। जोधपुर से इसकी शुरुआत की जा रही है। जहां पर 8 साल के रुद्र और 11 साल की सीता (बाघिन) को मेल कराने के लिए वन विभाग प्रयास कर रहा है। वन विभाग के सूत्रों के अनुसार पिंजरे में बंद और चिडिय़ाघरों में पैदा हुए बाघों में जंगली आदतें नहीं होती अत: पहले रुद्र और सीता को माचिया के बायलोजिकल पार्क में रखा जाएगा । मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक आर. एन. महरोत्रा के अनुसार सेंट्रल जू अथॉरिटी ने चिडिय़ाघरों में बाघों को साथ रखने की पाबंदी भले ही हटा ली हो लेकिन इसके लिए चिडिय़ाघरों में पर्याप्त संसाधनों का होना जरुरी है। सूत्रों के अनुसार वन विभाग के अधिकारियों में इस सेंट्रल जू अथॉरिटी के आदेश के बाद से ही दो मत हो गए हैं।
Thursday, February 11, 2010
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